नरसिंह मेहता

नरसिंह मेहता

नरसिंह मेहता का चौरा , जूनागढ़ , गुजरात
तलाजा, गुजरात (दिल्ली सल्तनत)

Divine Journey & Teachings

नरसिंह मेहता

परिचय

नरसिंह मेहता (लगभग 1414 – 1488), जिन्हें नरसिंह भगत के नाम से भी जाना जाता है, गुजरात के 15वीं शताब्दी के एक महान संत-कवि थे। उन्हें गुजराती भाषा का प्रथम कवि या आदि कवि माना जाता है। वे भगवान कृष्ण के परम भक्त थे और उन्होंने अपना जीवन भक्ति-प्रधान काव्य रचनाओं को समर्पित किया। उनके भजन गुजरात और राजस्थान में पाँच शताब्दियों से अधिक समय से लोकप्रिय हैं। उनकी प्रसिद्ध रचना “वैष्णव जन तो” महात्मा गांधी का प्रिय भजन था और यह स्वतंत्रता सेनानियों के बीच भी अत्यंत लोकप्रिय हुआ।

व्यक्तिगत जीवन

जन्म

  • जन्म: लगभग 1414
  • जन्म स्थान: तलाजा, गुजरात (दिल्ली सल्तनत)

मृत्यु

  • मृत्यु: 1488 (लगभग 73–74 वर्ष की आयु में)
  • स्थान: मंगरोल, सौराष्ट्र, गुजरात सल्तनत

जीवन परिचय 

नरसिंह मेहता के जीवन के बारे में अधिकतर जानकारी उनकी स्वयं की रचनाओं और कविताओं से प्राप्त होती है, क्योंकि उस समय के ऐतिहासिक दस्तावेज़ सीमित हैं। बाद के कवियों की रचनाओं में भी उनके जीवन की घटनाओं और व्यक्तित्व का वर्णन मिलता है। विद्वानों में उनके जन्म और मृत्यु की तिथियों को लेकर पूर्ण सहमति नहीं है, लेकिन यह निश्चित है कि वे 15वीं शताब्दी में जीवित थे और मंडलिका तृतीय के शासनकाल में सक्रिय थे।

प्रारंभिक जीवन 

नरसिंह मेहता का जन्म गुजरात के भावनगर जिले में स्थित तलाजा नगर में हुआ था। वे नागर ब्राह्मण समुदाय से थे और उनके पिता राजदरबार में प्रशासनिक पद पर कार्यरत थे।

कहा जाता है कि नरसिंह बचपन में आठ वर्ष की आयु तक मूक (बोल नहीं पाते) थे। बाद में एक संत के आशीर्वाद से उन्होंने “राधे श्याम” शब्द उच्चारित किया और तभी से बोलना प्रारंभ किया। उनके माता-पिता का निधन तब हो गया जब वे केवल पाँच वर्ष के थे, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनके बड़े भाई बंसीधर और भाभी ने किया।

उनकी रचनाओं की भाषा और शैली से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने पारंपरिक शिक्षा प्राप्त की थी और साहित्यिक ज्ञान भी अर्जित किया था, किंतु उनकी कविताएँ मुख्यतः भगवान कृष्ण की भक्ति पर केंद्रित हैं।

कृष्ण भक्ति की ओर प्रवृत्ति 

नरसिंह मेहता अपनी पत्नी माणेकबाई के साथ अपने बड़े भाई के घर में रहते थे, लेकिन उनकी भाभी उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करती थीं। वह अक्सर उनका अपमान और उपहास करती थीं।

एक दिन अपमान से दुखी होकर नरसिंह घर छोड़कर पास के वन में चले गए, जहाँ उन्होंने गोपनाथ महादेव मंदिर में एक शिवलिंग के पास सात दिनों तक उपवास और ध्यान किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें वृंदावन ले गए, जहाँ उन्होंने भगवान कृष्ण और गोपियों की रासलीला का दर्शन किया।

कथा के अनुसार, नरसिंह रासलीला देखने में इतने मग्न हो गए कि उन्हें यह भी पता नहीं चला कि उनके हाथ में पकड़ी मशाल से उनका हाथ जल रहा है। भगवान कृष्ण उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया। नरसिंह ने उनसे निरंतर भक्ति और उनके गुणगान करने की शक्ति मांगी।

भगवान कृष्ण ने उन्हें यह वरदान प्रदान किया और यह आश्वासन भी दिया कि वे सदैव उनके साथ रहेंगे। इसके बाद नरसिंह ने लगभग 22,000 कीर्तन और भजनों की रचना करने का संकल्प लिया।

इस दिव्य अनुभव के बाद नरसिंह अपने घर लौटे और अपनी भाभी के चरण स्पर्श कर उनका धन्यवाद किया, क्योंकि उनके अपमान के कारण ही उन्हें यह आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त हुआ। बाद में उन्होंने अपने भाई का घर छोड़ दिया और जूनागढ़ में एक छोटे से घर में रहने लगे, जहाँ उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह भगवान कृष्ण की भक्ति में समर्पित कर दिया।

जूनागढ़ में जीवन 

जूनागढ़ में नरसिंह मेहता अपनी पत्नी और दो बच्चों—पुत्र शामलदास तथा पुत्री कुंवरबाई—के साथ अत्यंत गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहे थे। उनकी पुत्री कुंवरबाई से उन्हें विशेष स्नेह था। इसी समय वे भजन गायक के रूप में प्रसिद्ध होने लगे। वे भगवान कृष्ण की भक्ति में लीन होकर सभी वर्गों, जातियों और स्त्री-पुरुषों के साथ मिलकर भजन गाते और नृत्य करते थे।

हालाँकि, जिस नागर ब्राह्मण समुदाय से वे संबंध रखते थे, उसे यह व्यवहार पसंद नहीं था। वे उच्च वर्ग के माने जाते थे और अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा, शिष्टाचार और दरबारी पदों के लिए प्रसिद्ध थे। उस समय कई नागर ब्राह्मण शिव के उपासक थे, जबकि नरसिंह मेहता कृष्ण के अनन्य भक्त थे। इसी कारण उन्हें समाज के विरोध और उपहास का सामना करना पड़ा।

नरसिंह की आत्मकथात्मक रचनाओं तथा बाद के कवियों की कृतियों में उनके जीवन की अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन मिलता है, जो उनकी कृष्ण भक्ति को दर्शाती हैं।

शामलदास का विवाह 

मदन मेहता नामक एक प्रभावशाली व्यक्ति की पुत्री के लिए योग्य वर की खोज में एक पुजारी जूनागढ़ आया। एक स्थानीय नागर ब्राह्मण ने उसे नरसिंह के पुत्र शामलदास से मिलने की सलाह दी, यह सोचकर कि वह नरसिंह की गरीबी देखकर यह बात अन्य स्थानों पर फैलाएगा।

लेकिन पुजारी ने शामलदास को योग्य मानकर विवाह निश्चित कर दिया। नरसिंह ने इस विवाह में भगवान कृष्ण को आमंत्रित किया, जिस पर अन्य ब्राह्मणों ने उनकी गरीबी का मजाक उड़ाया।

जब विवाह बारात निकली, तो वह अत्यंत साधारण थी, लेकिन जब वह गंतव्य पर पहुँची, तो वह भव्य और शानदार रूप में परिवर्तित हो गई। मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने स्वयं चमत्कारिक रूप से विवाह के लिए आवश्यक सभी वस्तुओं की व्यवस्था की।

इस घटना का वर्णन नरसिंह की रचना “शामलदास नो विवाह” (Putrah Vivah) में मिलता है, जिसमें भगवान कृष्ण अपने भक्त की सहायता करते हुए दिखाई देते हैं।

हुण्डी की घटना 

समाज के कुछ लोगों को नरसिंह की गरीबी पर संदेह था और वे उन्हें धोखेबाज मानते थे। नागर ब्राह्मणों ने कुछ यात्रियों को यह कहकर उकसाया कि वे नरसिंह से ₹700 की हुण्डी (प्रॉमिसरी नोट) लें, क्योंकि वे वास्तव में धनी हैं।

जब यात्रियों ने नरसिंह से संपर्क किया, तो वे समझ गए कि उन्हें छलने की कोशिश की जा रही है, फिर भी उन्होंने पैसा स्वीकार किया और द्वारका के एक व्यापारी शामलशा सेठ के नाम एक हुण्डी लिख दी।

जब यात्री द्वारका पहुँचे, तो उन्हें ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला और उन्होंने सोचा कि वे ठगे गए हैं। तभी एक व्यक्ति आया, जिसने स्वयं को शामलशा बताया और न केवल मूल राशि बल्कि ब्याज सहित पूरी रकम लौटा दी। माना जाता है कि यह भगवान कृष्ण का ही रूप था, जिन्होंने अपने भक्त की लाज रखी।

इस घटना पर आधारित नरसिंह की रचना “हुण्डी” अत्यंत प्रसिद्ध है, जिसमें वे भगवान से प्रार्थना करते हैं—
👉 “हे प्रभु, मेरी हुण्डी स्वीकार करो।”

कुंवरबाई का मामेरू 

नरसिंह की एक प्रसिद्ध आत्मकथात्मक रचना उनकी पुत्री कुंवरबाई के “मामेरू” (गर्भावस्था के सातवें महीने की रस्म) पर आधारित है। इस परंपरा के अनुसार, माता-पिता को अपनी पुत्री के ससुराल में उपहार देना होता था।

नरसिंह अत्यंत गरीब थे, इसलिए वे खाली हाथ ही ससुराल पहुँचे। जब उन्होंने उपहारों की सूची मांगी, तो उन्हें बहुत महंगे वस्त्र और सामग्री की सूची दी गई, जो उनके लिए असंभव थी।

इस पर उन्होंने भगवान कृष्ण से प्रार्थना की और शीघ्र ही एक व्यापारी (कृष्ण का ही रूप) वहाँ प्रकट हुआ, जिसने सभी उपहार प्रदान किए।

इस घटना का वर्णन उनकी रचना “कुंवरबाई नु मामेरू” में मिलता है।

कृष्ण की माला 

नागर ब्राह्मणों का विरोध लगातार बढ़ता गया और उन्होंने जूनागढ़ के राजा रा मंडलिका को नरसिंह की परीक्षा लेने के लिए उकसाया।

राजा ने नरसिंह पर झूठा आरोप लगाकर उनसे कहा कि यदि वे निर्दोष हैं, तो भगवान कृष्ण मंदिर की मूर्ति से माला भेजें।

नरसिंह ने पूरी रात भगवान से प्रार्थना की कि वे उनकी लाज रखें, ताकि लोग भक्ति के मार्ग से विचलित न हों।

अगली सुबह चमत्कार हुआ—
👉 भगवान कृष्ण ने स्वयं माला नरसिंह के गले में डाल दी।

यह देखकर राजा ने नरसिंह से क्षमा मांगी और उनकी भक्ति को स्वीकार किया।

अंतिम जीवन और विरासत 

नरसिंह मेहता के जीवन के अंतिम चरण के बारे में जानकारी मुख्यतः बाद के लेखकों की रचनाओं से प्राप्त होती है, जैसे नरसिंह मेहता नु आख्यान, जिसमें उनके वंश और पारिवारिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।

नरसिंह मेहता के जीवन की कई घटनाओं की तुलना अन्य संत-कवियों जैसे सूरदास, तुलसीदास, मीरा बाई, कबीर, नामदेव आदि से की जाती है। इन सभी की तरह नरसिंह मेहता को भी समाज के विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन वे अपनी भक्ति में अडिग रहे। उन्होंने जाति, धर्म और सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना सभी लोगों को स्वीकार किया, जो उस समय के नागर ब्राह्मण समाज में एक अनोखी बात थी और वैष्णव परंपरा के प्रति उनकी गहरी निष्ठा को दर्शाती है।

उनके जीवन में कई दुखद घटनाएँ भी हुईं। उनके पुत्र की कम आयु में मृत्यु हो गई, जिससे उनकी पत्नी अत्यंत दुःखी हुईं और कुछ समय बाद उनका भी निधन हो गया। इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद नरसिंह मेहता की भक्ति में कोई कमी नहीं आई। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वे मंगरोल चले गए, जहाँ लगभग 79 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

मंगरोल का श्मशान स्थल आज “नरसिंह नु श्मशान” के नाम से जाना जाता है, जो गुजराती भाषा के आदि कवि की स्मृति को समर्पित है। उनके सम्मान में “नरसिंह मेहता पुरस्कार” की स्थापना की गई, जो गुजराती साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया जाता है। इसके अलावा अहमदाबाद स्थित वस्त्रापुर झील का नाम भी उनके सम्मान में रखा गया है।

काव्य रचनाएँ 

नरसिंह मेहता की रचनाएँ मुख्यतः भगवान कृष्ण की भक्ति पर आधारित भजनों के रूप में जानी जाती हैं। उनके भजन गुजरात और राजस्थान में पाँच शताब्दियों से अधिक समय से गाए जा रहे हैं। उनकी रचनाएँ केवल भक्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनमें दार्शनिक और नैतिक विचार भी समाहित हैं, विशेष रूप से राधा और कृष्ण के प्रेम का वर्णन।

विशेषताएँ

नरसिंह के भजन गुजराती के “देशी” शैली में आते हैं, जिन्हें उत्तर भारतीय भाषाओं में “पद” कहा जाता है। ये रचनाएँ पारंपरिक छंद, लोकधुनों और लयों पर आधारित होती हैं। उनके भजनों में सुबह, वसंत और वर्षा ऋतु से संबंधित रागों का विशेष प्रयोग मिलता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, नरसिंह मेहता पहले कवि थे जिन्होंने कृष्ण भक्ति को उपयुक्त रागों में प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने भजनों को स्वयं गाया, लेकिन आज उनकी मूल धुनों का सटीक पुनर्निर्माण संभव नहीं है।

उनकी रचनाओं की एक विशेषता यह भी है कि वे मूल रूप में उपलब्ध नहीं हैं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक परंपरा के माध्यम से संरक्षित हुई हैं। उनकी सबसे पुरानी पांडुलिपि लगभग 1612 की मानी जाती है। समय के साथ उनकी भाषा में भी परिवर्तन हुए हैं, जो उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है।

उनकी रचनाएँ केवल धार्मिक संदर्भ तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि विद्यालयों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी गाई जाती हैं।

गुजराती लोकसंगीत में योगदान 

नरसिंह मेहता के भजन गुजराती लोकसंगीत की विभिन्न शैलियों में गाए जाते हैं, जैसे:

  • गरबी
  • ढोल
  • प्रभातिया

इनमें गरबी और ढोल उत्सव के अवसरों पर गाए जाते हैं, जबकि प्रभातिया सुबह के समय शांति और आनंद की भावना उत्पन्न करने के लिए गाए जाते हैं।

रचनाओं की श्रेणियाँ 

नरसिंह मेहता की रचनाओं को मुख्यतः चार श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:

  1. आत्मकथात्मक रचनाएँ – जैसे शामलदास नो विवाह, कुंवरबाई नु मामेरू, हुण्डी, हर माला आदि
  2. विविध कथाएँ – जैसे सुदामा चरित, दान लीला तथा भागवत पुराण पर आधारित कथाएँ
  3. श्रृंगार गीत – राधा और कृष्ण के प्रेम का वर्णन
  4. भक्ति और दार्शनिक रचनाएँ – उपदेशात्मक और आध्यात्मिक कविताएँ

महात्मा गांधी पर प्रभाव 

महात्मा गांधी ने नरसिंह मेहता की रचनाओं का व्यापक उपयोग अपने भाषणों और प्रार्थनाओं में किया। विशेष रूप से उनका भजन “वैष्णव जन तो” विश्वभर में करुणा, नैतिकता और मानवता का प्रतीक बन गया। गांधी ने नरसिंह मेहता के जीवन और काव्य को धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठाकर नैतिक और मानवीय मूल्यों के रूप में प्रस्तुत किया।

लोकप्रिय संस्कृति में स्थान 

नरसिंह मेहता के जीवन पर कई फिल्में और टीवी कार्यक्रम बनाए गए हैं:

  • नरसिंह मेहता (1932) – पहली गुजराती टॉकी फिल्म
  • नरसी भगत (1940) – हिंदी एवं गुजराती फिल्म
  • नरसी भगत (1957) – हिंदी जीवनी फिल्म
  • भगत नरसिंह मेहता (1984) – गुजराती फिल्म
  • नरसैयो (1991) – दूरदर्शन पर प्रसारित टीवी श्रृंखला

संस्कृत स्रोत और प्रभाव 

नरसिंह मेहता की रचनाओं पर भागवत पुराण और गीतगोविंद का गहरा प्रभाव देखा जाता है। उनके भजनों में कृष्ण की बाल लीलाएँ, गोपियों के साथ रास, और कालिया नाग का दमन जैसे प्रसंगों का वर्णन मिलता है।

उन्होंने संस्कृत श्लोकों को अपने गुजराती भजनों में समाहित किया और स्थानीय भाषा, लोकधुनों तथा सांस्कृतिक तत्वों के माध्यम से उन्हें जनसामान्य तक पहुँचाया। उनके प्रभातिया (सुबह के भजन) आज भी गुजरात की धार्मिक परंपराओं का अभिन्न हिस्सा हैं।

अतिरिक्त पठन 

गुजरात के राजकोट में स्थापित नरसिंह मेहता की प्रतिमा उनकी साहित्यिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है। नरसिंह मेहता के जीवन, काव्य और दर्शन को समझने के लिए अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ और शोध सामग्री उपलब्ध हैं।

नरसिंह मेहता की रचनाएँ 

  • नरसिंह मेहता, नरसिंह मेहतानी काव्यकृतियो, संपादक: शिवलाल जेसलपुरा, अहमदाबाद: साहित्य संशोधन प्रकाशन, 1989।
  • जयंत कोठारी एवं दर्शना ढोलकिया (संपादक), नरसिंह पदमाला, अहमदाबाद: गुर्जर ग्रंथरत्न कार्यालाय, 1997।
  • अनंतराय रावल (संपादक), नरसिंह मेहता ना पदो, अहमदाबाद: आदर्श प्रकाशन।
  • चंद्रकांत मेहता (संपादक), वैष्णव जन नरसिंह मेहता (हिंदी अनुवाद), गांधीनगर: गुजरात साहित्य अकादमी, 2016।

अंग्रेज़ी में आलोचनात्मक सामग्री 

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  • के. एम. मुंशी (1935), Gujarata and Its Literature: A Survey from the Earliest Times, बॉम्बे: लॉन्गमैन ग्रीन एंड कंपनी।
  • स्वामी महादेवानंद (अनुवादक), Devotional Songs of Narsi Mehta, वाराणसी: मोतीलाल बनारसीदास, 1985।
  • गोवर्धनराम त्रिपाठी, Poets of Gujarat and their Influence on Society and Morals, मुंबई: फोर्ब्स गुजराती सभा, 1958।
  • वाई. जे. त्रिपाठी, Kevaladvaita in Gujarati Poetry Like Akhil Bhramand, वडोदरा: ओरिएंटल इंस्टीट्यूट, 1958।
  • के. एम. झावेरी, Milestones in Gujarati Literature, बॉम्बे: एन. एम. त्रिपाठी एंड कंपनी, 1938।
  • मंसुखलाल झावेरी, History of Gujarati Literature, नई दिल्ली: साहित्य अकादमी, 1978।

गुजराती में आलोचनात्मक सामग्री 

  • रघुवीर चौधरी (संपादक), Narsinh Mehta: Aswad Ane Swadhyay, मुंबई, 1983।
  • ईश्वरलाल दवे (संपादक), Adi Kavi Ni Aarsh Wani: Narsinh Mehta ni Tatvadarshi Kavita, राजकोट, 1973।
  • मकरंद दवे, Narsinhnan Padoman Sidha-ras, जूनागढ़, 2000।
  • आर. दवे एवं ए. दवे (संपादक), Narsinh Mehta Adhyayn Granth, जूनागढ़, 1983।
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  • के. एम. मुंशी, Narsaiyyo Bhakta Harino, अहमदाबाद, 1952।
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संदर्भ 

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  • "Vastrapur Lake to become Narsinh Mehta Sarovar", देशगुजरात, 25 फरवरी 2013।
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  • "Slumdog makers in a spot over quiz answer", 18 अगस्त 2009।
  • Bhagat Narsinh Mehta (फिल्म संग्रह)।
  • मोहनलाल केवलिया (2007), "Krishna-Lila in the songs of Narasinha Mehta", ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस।

Reference Wikipedia