गुरु नानक देव जी सिख धर्म के संस्थापक, महान संत, समाज सुधारक और आध्यात्मिक गुरु थे। उनका जन्म एक हिंदू खत्री परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम मेहता कालू (कल्याण चंद) और माता का नाम माता त्रिप्ता था। बचपन से ही वे अत्यंत बुद्धिमान, शांत और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। उन्हें सांसारिक चीजों में कम और ईश्वर की भक्ति में अधिक रुचि थी।
युवावस्था में उनका विवाह माता सुलखनी से हुआ, जिनसे उनके दो पुत्र हुए – श्रीचंद और लक्ष्मी दास। कुछ समय तक उन्होंने सुल्तानपुर लोधी में नौकरी भी की, लेकिन उनका मन हमेशा ईश्वर की भक्ति और सत्य की खोज में लगा रहा।
एक दिन वे बेइन नदी में स्नान करने गए और तीन दिनों तक लापता रहे। जब वे वापस आए, तो उन्होंने कहा – “ना कोई हिंदू, ना कोई मुसलमान”। इस कथन का अर्थ यह था कि सभी मनुष्य एक ही परमात्मा की संतान हैं और धर्म के नाम पर भेदभाव करना गलत है।
इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन मानवता की सेवा और ईश्वर के संदेश को फैलाने में लगा दिया। उन्होंने चारों दिशाओं में लंबी यात्राएँ (उदासियाँ) कीं और लोगों को सच्चाई, ईमानदारी और भक्ति का मार्ग बताया। उन्होंने अंधविश्वास, पाखंड, जाति-भेद और सामाजिक बुराइयों का विरोध किया।
गुरु नानक देव जी का मुख्य संदेश था:
उन्होंने लंगर प्रथा की शुरुआत की, जहाँ सभी लोग बिना भेदभाव के एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। यह समानता और भाईचारे का प्रतीक है।
उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष करतारपुर में बिताए, जहाँ उन्होंने एक संगत (समाज) बनाई और लोगों को भक्ति का मार्ग दिखाया। 1539 ईस्वी में उनका निधन हुआ।
कहा जाता है कि उनकी मृत्यु के बाद हिंदू और मुस्लिम अनुयायियों में अंतिम संस्कार को लेकर विवाद हुआ, लेकिन जब चादर हटाई गई तो वहाँ केवल फूल मिले। इसके बाद दोनों समुदायों ने अपने-अपने तरीके से उनका अंतिम संस्कार किया।
गुरु नानक देव जी के उपदेश आज भी पूरी दुनिया में लोगों को सत्य, प्रेम, समानता और मानवता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।