शास्त्रीजी महाराज, जिनका जन्म डूंगर पटेल के रूप में हुआ था, स्वामीनारायण संप्रदाय के एक महान संत और Bochasanwasi Akshar Purushottam Swaminarayan Sanstha (BAPS) के संस्थापक थे। उन्होंने अक्षर-पुरुषोत्तम दर्शन का प्रचार किया और वैदिक ज्ञान, भक्ति तथा संगठन निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
डूंगर पटेल का जन्म एक धार्मिक किसान परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनमें आध्यात्मिक झुकाव और असाधारण बुद्धिमत्ता दिखाई देती थी। वे अन्य बच्चों की तरह खेल खेलने के बजाय मिट्टी से मंदिर बनाते और धार्मिक व्रत रखते थे। उन्होंने कम उम्र में ही महाभारत का पाठ किया, जिससे उनकी विद्वता का परिचय मिलता है।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा गाँव में प्राप्त की और बाद में संस्कृत तथा शास्त्रों का अध्ययन स्वामियों के मार्गदर्शन में किया। उनकी प्रतिभा और समर्पण ने उन्हें जल्दी ही आध्यात्मिक जीवन की ओर प्रेरित किया।
29 नवंबर 1882 को उन्हें स्वामीनारायण संप्रदाय में दीक्षा दी गई और उनका नाम यज्ञपुरुषदास स्वामी रखा गया। बाद में उनकी विद्वता के कारण उन्हें “शास्त्री” की उपाधि मिली। उन्होंने अपने गुरु भगतजी महाराज से अक्षर-पुरुषोत्तम उपासना का ज्ञान प्राप्त किया और इस सिद्धांत के प्रबल समर्थक बने।
उन्होंने विभिन्न ग्रंथों का अध्ययन किया और शास्त्रार्थ में अपनी अद्भुत प्रतिभा दिखाई। एक प्रसिद्ध घटना में उन्होंने संस्कृत विद्वान महिधर शास्त्री को वाद-विवाद में पराजित किया, जिससे उनकी विद्वता और प्रसिद्धि और बढ़ गई।
1905 के आसपास मतभेदों के कारण उन्होंने वडताल से अलग होकर अपने सिद्धांतों का प्रचार शुरू किया। 5 जून 1907 को गुजरात के बोचासन में उन्होंने एक मंदिर की स्थापना की, जहाँ अक्षर (गुणातीतानंद स्वामी) और पुरुषोत्तम (स्वामीनारायण) की मूर्तियों को स्थापित किया गया। यही घटना BAPS संगठन की स्थापना का आधार बनी।
उन्होंने अनेक कठिनाइयों और विरोधों के बावजूद अपने सिद्धांतों का प्रचार जारी रखा और कई मंदिरों का निर्माण कराया, जैसे सारंगपुर, गोंडल, अटलादरा और गढ़ड़ा।
शास्त्रीजी महाराज ने अपने जीवन में BAPS संगठन को मजबूत आधार प्रदान किया। उन्होंने भारत के साथ-साथ विदेशों, विशेष रूप से अफ्रीका में भी अपने विचारों का प्रचार किया। उनके संपर्क में कई प्रमुख व्यक्तित्व आए, जिनमें महात्मा गांधी भी शामिल थे।
उन्होंने संगठन के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए 1947 में BAPS को एक ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत कराया। 1950 में उन्होंने प्रमुख स्वामी महाराज को प्रशासनिक प्रमुख नियुक्त किया और योगीजी महाराज को अपना आध्यात्मिक उत्तराधिकारी बनाया।
शास्त्रीजी महाराज की सबसे बड़ी विरासत BAPS संगठन की स्थापना है। उन्होंने अक्षर-पुरुषोत्तम उपासना को एक मजबूत आधार दिया और मंदिर निर्माण के माध्यम से इसे व्यापक रूप से फैलाया।
वे एक दृढ़, करिश्माई और दूरदर्शी नेता थे, जिन्होंने अनेक कठिनाइयों के बावजूद अपने सिद्धांतों को स्थापित किया। उन्होंने अपने अनुयायियों को सच्चाई, भक्ति और सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
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