प्रभात रंजन सरकार (21 मई 1921 – 21 अक्टूबर 1990), जिन्हें उनके आध्यात्मिक नाम श्री श्री आनंदमूर्ति के नाम से भी जाना जाता है, एक महान आध्यात्मिक गुरु, दार्शनिक, समाज सुधारक, भाषाविद्, लेखक और संगीतकार थे। उनके अनुयायी उन्हें “बाबा” (पिता) के रूप में संबोधित करते थे। उन्होंने लगभग 5,018 गीतों की रचना की, जिन्हें मुख्यतः बंगाली भाषा में “प्रभात संगीत” कहा जाता है।
उन्होंने 1955 में आनंद मार्ग (Ananda Marga) की स्थापना की, जो एक आध्यात्मिक और सामाजिक संगठन है, जो ध्यान, योग तथा सामाजिक सेवा के माध्यम से मानव कल्याण के लिए कार्य करता है।
प्रभात रंजन सरकार ने कोलकाता विश्वविद्यालय के अंतर्गत विद्यासागर कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की। हालांकि, पिता की मृत्यु के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी।
प्रभात रंजन सरकार का जन्म वैशाख पूर्णिमा (बुद्ध पूर्णिमा) के दिन हुआ था। उनका परिवार मूलतः पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले से संबंधित था।
1939 में वे जमालपुर से कोलकाता आए और अपनी उच्च शिक्षा प्रारंभ की। पिता के निधन के बाद उन्होंने परिवार के पालन-पोषण हेतु भारतीय रेल के मुख्यालय (जमालपुर) में लेखाकार के रूप में कार्य किया। इसी दौरान उन्होंने अपने सहकर्मियों को योग और तंत्र ध्यान की शिक्षा देना शुरू किया, जिससे धीरे-धीरे उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी।
1955 में उन्होंने आनंद मार्ग नामक एक सामाजिक-आध्यात्मिक आंदोलन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य था—
👉 “आत्म-साक्षात्कार और समस्त मानवता की सेवा”
उन्होंने वैदिक और तांत्रिक दर्शन का समन्वय करते हुए एक नई आध्यात्मिक साधना प्रणाली विकसित की।
प्रभात रंजन सरकार ने अपने दर्शन में धार्मिक कट्टरता, जातिवाद, भौतिकवाद और पूंजीवाद की आलोचना की और इन्हें सामाजिक विकास तथा आध्यात्मिक उन्नति में बाधा बताया।
उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया कि:
👉 संपूर्ण ब्रह्मांड चेतना का ही एक रूप है, जो अपनी ही प्रकृति के बंधन में आकर सृष्टि का निर्माण करता है।
उनका सामाजिक-आर्थिक सिद्धांत PROUT (Progressive Utilization Theory) था, जो नवमानवतावाद (Neohumanism) पर आधारित है। यह सिद्धांत मानव, समाज और प्रकृति के समग्र विकास पर बल देता है।
आनंद मार्ग संगठन विश्वभर में ध्यान, योग, शिक्षा और सामाजिक सेवा के कार्य करता है। इस संगठन के माध्यम से अनेक राहत कार्य, शिक्षा परियोजनाएँ और सेवा कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं।
उन्होंने “Subháśita Samgraha” नामक ग्रंथों की श्रृंखला में अपने विचारों को संकलित किया, जो आनंद मार्ग के दार्शनिक आधार हैं।
1971 में प्रभात रंजन सरकार को आनंद मार्ग के सदस्यों की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया। उन्होंने अपने ऊपर हुए विषाक्तता (poisoning) के आरोप की जांच की मांग को लेकर लंबा उपवास किया, जो लगभग पाँच वर्ष तक चला।
अंततः 2 अगस्त 1978 को उन्हें सभी आरोपों से बरी कर रिहा कर दिया गया।
1979 में उन्होंने विश्व के कई देशों—स्विट्जरलैंड, जर्मनी, फ्रांस, स्कैंडिनेविया, मध्य पूर्व, फिलीपींस, थाईलैंड, ताइवान, जमैका और वेनेजुएला—का दौरा किया और अपने अनुयायियों से मिले।
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वे कोलकाता के लेक गार्डन्स में रहते थे। उन्होंने आनंद नगर नामक एक आदर्श विकास समुदाय की स्थापना की, जो उनके PROUT सिद्धांत पर आधारित था।
7 सितंबर 1990 को उन्होंने आनंद मार्ग गुरुकुल की स्थापना की, जिसका उद्देश्य उनके विचारों का संरक्षण और प्रसार करना था।
21 अक्टूबर 1990 को हृदयाघात के कारण उनका निधन हो गया।
प्रभात रंजन सरकार ने लाभ-केन्द्रित पूंजीवाद, भोगवादी भौतिकवाद और धार्मिक कट्टरता की आलोचना करते हुए एक व्यापक आध्यात्मिक दर्शन विकसित किया, जिसे नवमानवतावाद (Neo-Humanism) कहा जाता है। इस दर्शन में आध्यात्मिक, आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और नैतिक तत्वों का समावेश है। उनके अनुसार वास्तविक प्रगति चेतना के विकास के साथ जुड़ी होती है और इसका उद्देश्य समस्त मानवता का कल्याण है।
उन्होंने प्रेम, सम्मान, स्वतंत्रता, समानता और न्याय को मानव जीवन के मूल आदर्श माना। सरकार के अनुसार भविष्य में एक “नैतिक समाज” की आवश्यकता है, जिसमें प्रतिस्पर्धा की बजाय सहयोग, लाभ की बजाय सामूहिक कल्याण और स्वार्थ की बजाय उच्च आदर्शों को महत्व दिया जाए। उन्होंने “नव (द्वितीय) प्रबोधन” की अवधारणा प्रस्तुत की, जो मानवता के नैतिक, मानसिक और सामाजिक परिवर्तन को दर्शाती है।
सरकार के अनुसार यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड “कॉस्मिक माइंड” (ब्रह्म चेतना) के भीतर विद्यमान है। यह चेतना अपनी ही प्रकृति के बंधन में आकर सृष्टि का निर्माण करती है। उन्होंने ब्रह्मांडीय प्रवाह को इस प्रकार बताया—
👉 असीम चेतना → सीमित चेतना → पुनः असीम चेतना
यह प्रक्रिया ध्यान (Meditation) के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है।
सरकार के अनुसार मानव मन पाँच स्तरों (कोष) से बना है:
सरकार ने “चक्र” (ऊर्जा केंद्र) की अवधारणा को तंत्र और शरीर विज्ञान के साथ जोड़ा। उनके अनुसार शरीर में विभिन्न चक्र होते हैं, जो मानसिक प्रवृत्तियों और ग्रंथियों (glands) को नियंत्रित करते हैं:
इन चक्रों का संबंध शरीर की ग्रंथियों और हार्मोन से होता है, जो मन और व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
“माइक्रोविटा” का अर्थ है सूक्ष्म जीवन तत्व। सरकार के अनुसार ये परमाणु और उप-परमाणु कणों से भी सूक्ष्म होते हैं और चेतना के स्तर पर कार्य करते हैं। उनका मानना था कि भविष्य में विज्ञान इनका अस्तित्व सिद्ध करेगा।
सरकार के दर्शन का केंद्र बिंदु साधना है, जिसे उन्होंने भययुक्त प्रेम को निर्भय प्रेम में बदलने की प्रक्रिया बताया।
उन्होंने अनुयायियों को निम्न अभ्यास सुझाए:
सामूहिक साधना का समापन गुरु पूजा मंत्र से होता है।
सरकार ने समाज को चार वर्गों (वर्ण) में विभाजित किया:
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह जाति नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है। वे जातिविहीन समाज के समर्थक थे, जहाँ सभी को समान अवसर मिले।
सरकार के अनुसार वास्तविक प्रगति केवल आर्थिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक विकास पर आधारित होनी चाहिए। उन्होंने पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों की आलोचना की और कहा कि ये मानवता के लिए उपयुक्त नहीं हैं।
1959 में सरकार ने PROUT सिद्धांत विकसित किया, जिसका उद्देश्य था—
👉 संसाधनों का न्यायपूर्ण और सतत उपयोग
इसके मुख्य सिद्धांत हैं:
इस सिद्धांत को लागू करने के लिए उन्होंने “प्राउटिस्ट यूनिवर्सल” संगठन की स्थापना की।
1982 में प्रभात रंजन सरकार ने मानव समाज के विषय में अपने विचारों का विस्तार करते हुए नवमानवतावाद (Neohumanism) का सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार जहाँ सामान्य मानवतावाद केवल मनुष्य-केंद्रित दृष्टिकोण तक सीमित रहता है, वहीं नवमानवतावाद उसे सार्वभौमिकता (Universalism) तक ले जाता है।
सरकार ने कहा कि—
👉 जब मानवतावाद की मूल भावना को इस ब्रह्मांड के सभी सजीव और निर्जीव तत्वों तक विस्तारित किया जाता है, तो उसे “नवमानवतावाद” कहा जाता है।
इस सिद्धांत के अनुसार सभी जीवों के लिए उपयोगिता (utility) से अधिक अस्तित्व (existential value) का महत्व है।
नवमानवतावाद में तर्कशीलता (rationality) को विशेष महत्व दिया गया है। यह “प्रोटो-आध्यात्मिक मानसिकता” को विकसित करने पर बल देता है, जिसमें व्यक्ति हर वस्तु—चाहे बाहरी हो या आंतरिक—को परम चेतना (ब्रह्म) की अभिव्यक्ति के रूप में देखता है।
सरकार के अनुसार तर्कशीलता से भक्ति उत्पन्न होती है, और भक्ति मानवता का सर्वोच्च और सबसे मूल्यवान गुण है। नवमानवतावाद मनुष्य के बौद्धिक विकास को कट्टरता, स्वार्थ और मानसिक बंधनों से मुक्त करता है तथा आंतरिक और बाह्य संसार के बीच संतुलन स्थापित करता है।
1961 में रांची में दिए गए अपने भाषणों में सरकार ने “संस्कृति” और “रीति-रिवाज (Customs)” के बीच अंतर स्पष्ट किया।
उनके अनुसार—
👉 संस्कृति जीवन की विभिन्न अभिव्यक्तियों का समग्र रूप है, जो सार्वभौमिक होती है।
👉 जबकि रीति-रिवाज स्थानीय और समूह विशेष की अभिव्यक्ति होते हैं।
उन्होंने कहा कि संपूर्ण मानव जाति की संस्कृति एक ही है, केवल उसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग स्थानों पर भिन्न रूप में दिखाई देती है। इसलिए भाषा या संस्कृति के आधार पर विभाजन करना गलत है।
प्रभात रंजन सरकार ने अपने जीवन में अत्यंत विशाल साहित्यिक विरासत छोड़ी। उन्होंने लगभग 250 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनमें से अधिकांश उनके प्रवचनों और भाषणों का संकलन हैं।
उन्होंने निम्न विषयों पर व्यापक लेखन किया:
उनकी भाषाविज्ञान से संबंधित प्रमुख कृति “शब्द चयनिका” (Shabda Cayanika) है, जो बंगाली भाषा पर आधारित एक विस्तृत विश्वकोश है।
उन्होंने 1982 में नवमानवतावाद और 1986 में माइक्रोविटा सिद्धांत की स्थापना की।
1982 में प्रभात रंजन सरकार ने संगीत रचना प्रारंभ की। अपने जीवन के अंतिम आठ वर्षों में उन्होंने 5018 गीतों की रचना की, जो विभिन्न भाषाओं में हैं।
उनके इन गीतों का संग्रह “प्रभात संगीत” (Prabhat Samgiita) के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है—
👉 “नव प्रभात के गीत”
Reference Wikipedia