जन्म नाम: वासुदेव
जन्म: लगभग 1199 (या 1238)
पजक, उडुपी के पास
कर्नाटक
मृत्यु: लगभग 1278 (या 1317)
सम्मान:
धर्म: हिन्दू धर्म
संप्रदाय: वेदांत
संस्थापक: उडुपी श्रीकृष्ण मठ
दर्शन: तत्त्ववाद (द्वैत)
गुरु:
अवतार: मुख्यप्राण / वायु देव
मध्वाचार्य (1199–1278 या 1238–1317), जिन्हें पूर्णप्रज्ञ और आनंद तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है, एक महान भारतीय दार्शनिक और द्वैत वेदांत के प्रमुख प्रवर्तक थे।
उन्होंने अपने दर्शन को “तत्त्ववाद” कहा, जिसका अर्थ है “यथार्थवादी दृष्टिकोण”।
मध्वाचार्य का जन्म कर्नाटक के पश्चिमी तट पर उडुपी के पास पजक में हुआ था।
उन्होंने किशोरावस्था में संन्यास ग्रहण किया और ब्रह्म सम्प्रदाय के गुरु अच्युत प्रेक्ष के शिष्य बने।
उन्होंने हिन्दू दर्शन के प्रमुख ग्रंथों का अध्ययन किया और उपनिषद, भगवद्गीता तथा ब्रह्मसूत्र (प्रस्थानत्रयी) पर टीकाएँ लिखीं।
उन्होंने संस्कृत में लगभग 37 ग्रंथों की रचना की।
उनकी लेखन शैली संक्षिप्त और गूढ़ थी।
उनका प्रमुख ग्रंथ “अनुव्याख्यान” माना जाता है, जो ब्रह्मसूत्र पर उनकी टीका का दार्शनिक विस्तार है।
कुछ ग्रंथों में उन्होंने स्वयं को वायु देव का अवतार बताया, हालांकि आधुनिक विद्वानों ने इस पर प्रश्न उठाए हैं।
मध्वाचार्य का दर्शन इस सिद्धांत पर आधारित है कि:
उन्होंने अद्वैत वेदांत और विशिष्टाद्वैत वेदांत के सिद्धांतों का विरोध किया।
उनके अनुसार मोक्ष केवल भगवान की कृपा से ही संभव है।
मध्वाचार्य ने भारत के विभिन्न भागों की यात्रा की, जैसे:
इन यात्राओं के दौरान उन्होंने दार्शनिक वाद-विवाद किए और धार्मिक केंद्रों का भ्रमण किया।
मध्वाचार्य ने उडुपी में श्रीकृष्ण मठ की स्थापना की।
कहा जाता है कि उन्होंने 1285 ईस्वी में द्वारका (गुजरात) से श्रीकृष्ण की मूर्ति लाकर यहाँ स्थापित की।
मध्वाचार्य का द्वैत दर्शन:
वे वेदांत की तीन प्रमुख धाराओं में से एक के प्रवर्तक माने जाते हैं:
मध्वाचार्य की जन्मतिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद है।
उनके पिता का नाम मध्यगेह (नडुइल्लया) और माता का नाम सत्यवती या वेदवती माना जाता है।
उनका जन्म तुलु ब्राह्मण परिवार में हुआ और उनका नाम वासुदेव रखा गया।
उन्होंने 7 वर्ष की आयु में उपनयन संस्कार प्राप्त किया और प्रारंभ से ही अध्ययन में अत्यंत तेज थे।
Reference Wikipedia