संत कनकदास

संत कनकदास

कनक गुरु पीठ
बाडा, शिगगांव, विजयनगर साम्राज्य (वर्तमान हावेरी जिला, कर्नाटक, भारत)

Divine Journey & Teachings

संत कनकदास

(कनकदास का चित्र)

व्यक्तिगत जीवन

जन्म नाम: थिम्मप्पा नायक
जन्म: 30 नवम्बर 1508
बाडा, शिगगांव, विजयनगर साम्राज्य (वर्तमान हावेरी जिला, कर्नाटक, भारत)

मृत्यु: 1606 (आयु 97–98 वर्ष)
कागिनेले

माता-पिता:

  • पिता: बीरप्पा
  • माता: बच्चम्मा

व्यवसाय: शासक, संत, कवि, दार्शनिक, संगीतकार

धार्मिक जीवन

संप्रदाय: हरिदास (दासकूट)
दर्शन: द्वैत, वैष्णववाद

गुरु

व्यासतीर्थ

परिचय

कनकदास (1509–1606), जिन्हें “दासश्रेष्ठ कनकदास” भी कहा जाता है, कर्नाटक के एक महान हरिदास संत, दार्शनिक और कवि थे।

वे मध्वाचार्य के द्वैत दर्शन के अनुयायी और व्यासतीर्थ के शिष्य थे।

कनकदास कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध रचनाकार, समाज सुधारक और भक्त कवि थे।

उन्होंने कन्नड़ भाषा में अनेक कीर्तन, उगाभोग और भक्ति रचनाएँ कीं।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

कनकदास का जन्म कर्नाटक के बाडा गाँव (बंकापुर के पास) में कुरुबा परिवार में हुआ था।

वे प्रारंभ में एक योद्धा थे और बंकापुर किले में सेवा करते थे।

उनकी शिक्षा श्रीनिवासाचार्य के मार्गदर्शन में हुई और उन्होंने तर्क, व्याकरण और मीमांसा में दक्षता प्राप्त की।

एक युद्ध में घायल होने के बाद उन्होंने भगवान हरि (कृष्ण) का नाम जपना शुरू किया।

कहानी के अनुसार, एक भिखारी उनके सामने आया और कनकदास ने उससे पूछा कि वह कौन है।

भिखारी ने उत्तर दिया कि वह वही है जिसे कनकदास बुला रहे थे। कनकदास ने उसे भगवान हरि के रूप में पहचाना।

भगवान हरि ने उन्हें तीन वरदान देने का प्रस्ताव दिया:

  1. सभी घावों से मुक्ति
  2. जब भी वे पुकारें, भगवान उनके सामने प्रकट हों
  3. भगवान अपने वास्तविक स्वरूप में दर्शन दें

भगवान ने उनकी इच्छाएँ पूरी कीं। इस घटना के बाद कनकदास ने सैनिक जीवन छोड़ दिया और भक्ति, संगीत और दर्शन के प्रचार में लग गए।

उनकी प्रारंभिक रचनाओं में शामिल हैं:

  • नरसिंह स्तोत्र
  • राम ध्यान मंत्र
  • मोहन तरंगिणी

उडुपी में

कनकदास का उडुपी से विशेष संबंध था क्योंकि वे व्यासतीर्थ के शिष्य थे।

कहा जाता है कि मंदिर के पुजारियों ने उन्हें निम्न जाति का समझकर मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया।

तब एक चमत्कार हुआ — मंदिर की दीवार में दरार पड़ गई और भगवान कृष्ण की मूर्ति कनकदास की ओर घूम गई।

यह घटना आज भी “कनकना किंडी” (Kanakana Kindi) के नाम से प्रसिद्ध है।

कागिनेले

कनकदास ने कागिनेले में कुछ समय बिताया और “कागिनेलेया आदिकेशव” नाम का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया, जो वहाँ के देवता का संकेत है।

वे भगवान कृष्ण (विष्णु) के महान भक्त थे।

प्रमुख रचनाएँ

कनकदास ने लगभग 240 कर्नाटक संगीत रचनाएँ कीं, जिनमें कीर्तन, उगाभोग और भक्ति गीत शामिल हैं।

प्रमुख ग्रंथ:

  • नलचरित्रे (ನಳಚರಿತ್ರೆ)
  • हरिभक्तिसार (ಹರಿಭಕ್ತಿಸಾರ)
  • नरसिंहस्तव (ನೃಸಿಂಹಸ್ತವ)
  • रामधान्यचरिते (ರಾಮಧಾನ್ಯಚರಿತೆ) — सामाजिक संघर्ष पर आधारित रचना
  • मोहनतरंगिणी (ಮೋಹನತರಂಗಿಣಿ)

कनकदास किला और महल

कर्नाटक के बाडा (शिगगांव क्षेत्र) में खुदाई के दौरान एक किला और महल के अवशेष मिले, जिन्हें कनकदास के समय का माना गया।

कर्नाटक सरकार ने यहाँ नया किला, महल और कनकदास की मूर्तियाँ स्थापित की हैं, जो उनके जीवन को दर्शाती हैं।

लोकप्रिय संस्कृति

  • कन्नड़ फिल्म अभिनेता डॉ. राजकुमार ने 1960 की फिल्म भक्त कनकदास में उनका अभिनय किया।
  • गिरीश कर्नाड ने 1988 में “कनक-पुरंदर” नामक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई।

Reference Wikipedia