सद्गुरु (जग्गी वासुदेव)

सद्गुरु (जग्गी वासुदेव)

ईशा योग केंद्र
मैसूर, कर्नाटक, भारत

Divine Journey & Teachings

सद्गुरु (जग्गी वासुदेव)

परिचय

सद्गुरु, जिनका वास्तविक नाम जगदीश (जग्गी) वासुदेव है, एक प्रसिद्ध भारतीय आध्यात्मिक गुरु, योग शिक्षक और लेखक हैं। उनका जन्म 3 सितंबर 1957 को मैसूर (कर्नाटक) में हुआ था। वे ईशा फाउंडेशन के संस्थापक हैं, जिसका मुख्यालय कोयंबटूर, तमिलनाडु में स्थित है। यह संस्था 1992 में स्थापित हुई और योग, शिक्षा तथा आध्यात्मिक गतिविधियों का संचालन करती है। सद्गुरु 1982 से योग सिखा रहे हैं और वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी नियमित रूप से वक्ता के रूप में भाग लेते हैं।

व्यक्तिगत जीवन

  • जन्म नाम: जगदीश वासुदेव
  • जन्म: 3 सितंबर 1957
  • जन्म स्थान: मैसूर, कर्नाटक, भारत
  • शिक्षा: मैसूर विश्वविद्यालय (बीए – अंग्रेज़ी साहित्य)
  • पत्नी: विजयकुमारी (विवाह 1984, निधन 1997)
  • संतान: 1 (राधे)

प्रारंभिक जीवन

सद्गुरु का जन्म एक तेलुगु परिवार में हुआ था। उनके पिता बी. वी. वासुदेव मैसूर रेलवे अस्पताल में नेत्र चिकित्सक थे और उनकी माता सुशीला वासुदेव गृहिणी थीं। वे अपने परिवार में पाँच बच्चों में सबसे छोटे थे।

उन्होंने अपनी औपचारिक शिक्षा पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा में विशेष रुचि नहीं दिखाई, लेकिन एक वर्ष बाद उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और अंग्रेज़ी साहित्य का अध्ययन किया, जिसमें उन्होंने द्वितीय स्थान प्राप्त किया। उनके माता-पिता चाहते थे कि वे आगे की पढ़ाई जारी रखें, लेकिन उन्होंने व्यवसाय में करियर बनाने का निर्णय लिया।

कार्य और करियर

स्नातक होने के बाद उन्होंने मैसूर में एक पोल्ट्री फार्म (मुर्गी पालन व्यवसाय) शुरू किया। यह व्यवसाय सफल रहा और इससे उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिली। इसके बाद उन्होंने “बिल्डएड्स” नामक एक निर्माण कंपनी शुरू की।

25 वर्ष की आयु में गहरे आध्यात्मिक अनुभवों के बाद उन्होंने अपने सभी व्यवसाय बंद कर दिए और योग तथा आध्यात्मिकता के मार्ग पर चल पड़े।

1983 में उन्होंने मैसूर में अपनी पहली योग कक्षा शुरू की और इसके बाद कर्नाटक तथा हैदराबाद में मोटरसाइकिल से यात्रा करते हुए योग सिखाने लगे। उनकी योग शैली “सहज स्थिति योग” के नाम से जानी जाती है।

आध्यात्मिक अनुभव 

23 सितंबर 1982 को चामुंडी पहाड़ी पर बैठे हुए उन्हें एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव हुआ। उन्होंने अनुभव किया कि वे स्वयं और उनके आसपास की हर वस्तु एक ही अस्तित्व का हिस्सा हैं।

इसके बाद उन्होंने लंबे समय तक ध्यान और यात्रा की और अंततः यह निर्णय लिया कि वे अपने अनुभवों को लोगों के साथ साझा करेंगे और योग सिखाएंगे।

ईशा फाउंडेशन 

1992 में सद्गुरु ने ईशा फाउंडेशन की स्थापना की। 1994 में उन्होंने कोयंबटूर के पास वेल्लियांगिरी पहाड़ियों के निकट भूमि खरीदकर ईशा योग केंद्र की स्थापना की। यह संस्था मुख्य रूप से स्वयंसेवकों द्वारा संचालित होती है और विभिन्न योग कार्यक्रम संचालित करती है।

संस्था का एक प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण भारत में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना भी है, जिसके लिए “ईशा विद्या” नामक पहल चलाई जाती है।

प्रमुख कार्य और पहलें

सद्गुरु ने कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और पर्यावरणीय अभियानों का नेतृत्व किया है, जैसे:

  • Inner Engineering
  • ध्यानलिंग (Dhyanalinga)
  • आदियोगी: योग का स्रोत
  • Rally for Rivers
  • Cauvery Calling
  • Save Soil Movement

उन्हें 2017 में भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

व्यक्तिगत जीवन

सद्गुरु को मोटरसाइकिल चलाने का शौक है और वे लंबी यात्राएँ करना पसंद करते हैं। वे शाकाहार का समर्थन करते हैं, लेकिन यात्रा के दौरान आवश्यकता होने पर समुद्री भोजन भी ग्रहण करते हैं।

वे प्रतिदिन लगभग 40 मिनट तक सूर्य नमस्कार का अभ्यास करते हैं।

आलोचना 

सद्गुरु को कुछ मामलों में आलोचना का सामना भी करना पड़ा है, विशेष रूप से उनके कुछ विचारों और दावों को छद्म-विज्ञान से जोड़कर देखा गया है।

पर्यावरणीय गतिविधियाँ

ईशा फाउंडेशन के माध्यम से सद्गुरु ने पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण परियोजनाएँ और अभियान शुरू किए हैं, जिनमें प्रोजेक्ट ग्रीनहैंड्स (PGH), रैली फॉर रिवर्स, कावेरी कॉलिंग और सेव सॉइल (मिट्टी बचाओ अभियान) प्रमुख हैं।

प्रोजेक्ट ग्रीनहैंड्स की स्थापना तमिलनाडु में जल और मिट्टी से संबंधित समस्याओं को दूर करने के लिए वनों के पुनरोपण (reforestation) के माध्यम से की गई। जुलाई 2019 में शुरू किया गया “कावेरी कॉलिंग” अभियान कावेरी नदी के किनारे वृक्षारोपण के माध्यम से जल स्तर और भूजल को पुनः भरने पर केंद्रित था।

2017 में सद्गुरु ने “रैली फॉर रिवर्स” अभियान शुरू किया, जिसका उद्देश्य भारत की नदियों के पुनर्जीवन के लिए व्यापक जनसमर्थन जुटाना था। 2022 में उन्होंने “जर्नी टू सेव सॉइल” अभियान के तहत लंदन से भारत तक 100 दिनों की मोटरसाइकिल यात्रा की, जिसका उद्देश्य मिट्टी के क्षरण के प्रति जागरूकता फैलाना और जैविक खेती के महत्व को बताना था।

मई 2022 में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के मरुस्थलीकरण रोकथाम सम्मेलन में 195 देशों के नेताओं को संबोधित किया। विश्व पर्यावरण दिवस 2022 पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उनके साथ एक कार्यक्रम में शामिल हुए, जहाँ मिट्टी के स्वास्थ्य पर चर्चा की गई।

हालाँकि, “सेव सॉइल” अभियान को लेकर मतभेद भी देखने को मिले हैं। कुछ विशेषज्ञों ने इसे सकारात्मक पहल बताया, जबकि कुछ ने इसे “ग्रीनवॉशिंग” भी कहा है।

भाषण और लेखन 

सद्गुरु ने 30 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

  • Inner Engineering: A Yogi's Guide to Joy
  • Karma: A Yogi's Guide to Crafting Your Destiny
  • Death

वे एक लोकप्रिय वक्ता हैं और विश्व के कई प्रतिष्ठित मंचों पर भाषण दे चुके हैं, जैसे:

  • संयुक्त राष्ट्र का मिलेनियम वर्ल्ड पीस समिट
  • ब्रिटिश हाउस ऑफ लॉर्ड्स
  • मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT)
  • वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (2007, 2017, 2020) 

सम्मान

2017 में सद्गुरु को भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया, जो भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।

उसी वर्ष उन्होंने कोयंबटूर में आदियोगी शिव प्रतिमा का निर्माण कराया, जिसकी ऊँचाई 34 मीटर (112 फीट) है। इसे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड द्वारा दुनिया की सबसे बड़ी अर्ध-प्रतिमा (bust) घोषित किया गया।

इसके अतिरिक्त, उन्हें भारत के प्रभावशाली व्यक्तियों की सूची में भी स्थान मिला:

  • 2012 में The Indian Express की सूची में 92वाँ स्थान
  • 2019 में India Today की सूची में 40वाँ स्थान 

राजनीतिक विचार 

सद्गुरु ने कहा है कि वे किसी राजनीतिक दल से जुड़े नहीं हैं और लोगों को भी किसी दल से अंध समर्थन नहीं करना चाहिए। वे लोगों को सलाह देते हैं कि वे सरकार के कार्यों का मूल्यांकन करके निर्णय लें।

हालाँकि, कुछ लोगों ने उनके विचारों को हिंदू राष्ट्रवाद या भाजपा के समर्थन से जोड़ा है।

2019 में उन्होंने एक टिप्पणी के लिए माफी भी माँगी थी। इसके अलावा, उन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के समर्थन में भी अपनी राय व्यक्त की।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आलोचना

सद्गुरु के कुछ विचार वैज्ञानिक सहमति से मेल नहीं खाते, जिसके कारण उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा है।

उन्होंने पारंपरिक भारतीय चिकित्सा (जैसे सिद्ध चिकित्सा) में पारे (Mercury) के उपयोग का समर्थन किया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय समझौतों में इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है।

उन्होंने यह भी दावा किया है कि वे सामान्य तापमान पर पारे को ठोस बना सकते हैं, जिसे वैज्ञानिकों ने अस्वीकार किया है।

इसके अलावा, चंद्र ग्रहण के प्रभावों पर उनके कुछ विचारों की भी आलोचना की गई है।

Reference Wikipedia