हंस महाराज / हंस राम सिंह रावत)

हंस महाराज / हंस राम सिंह रावत)

प्रेम नगर आश्रम , हरिद्वार
गढ़ की सेरहिया, उत्तराखंड (तत्कालीन ब्रिटिश भारत)

Divine Journey & Teachings

हंस महाराज / हंस राम सिंह रावत)

परिचय

हंस राम सिंह रावत (8 नवंबर 1900 – 19 जुलाई 1966), जिन्हें श्री हंस जी महाराज के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय धार्मिक गुरु और आध्यात्मिक नेता थे। उनके अनुयायी उन्हें सतगुरु मानते थे और प्रेमपूर्वक “गुरु महाराज जी” कहकर संबोधित करते थे।

व्यक्तिगत जीवन

  • जन्म: 8 नवंबर 1900
  • जन्म स्थान: गढ़ की सेरहिया, उत्तराखंड (तत्कालीन ब्रिटिश भारत)
  • मृत्यु: 19 जुलाई 1966, दिल्ली
  • पिता: रणजीत सिंह रावत
  • माता: कालिंदी देवी
  • पत्नी: सिंदुरी देवी (प्रथम), राजेश्वरी देवी (द्वितीय)
  • संतान: सवित्री, सतपाल, महीपाल, धरमपाल, प्रेमपाल

प्रारंभिक जीवन

हंस राम सिंह रावत का जन्म हरिद्वार के पास गढ़ की सेरहिया नामक गाँव में हुआ था। बचपन में ही उनकी माता का निधन हो गया, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी बुआ ने किया। वे बचपन से ही आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे और युवा अवस्था में उन्होंने विभिन्न संतों और साधुओं से मिलने के लिए अनेक तीर्थ स्थलों की यात्रा की।

शुरुआत में वे आर्य समाज से भी जुड़े, जो हिन्दू धर्म में जाति भेद और मूर्ति पूजा के विरोध के लिए प्रसिद्ध था।

आध्यात्मिक यात्रा और गुरु से भेंट

काम की तलाश में वे लाहौर पहुँचे, जहाँ उनकी भेंट स्वामी स्वरूपानंद से हुई, जो अद्वैत मत की परंपरा के गुरु थे।

1923 में स्वामी स्वरूपानंद ने उन्हें ज्ञान (क्रिया) की शिक्षा दी। हंस महाराज ने इस अनुभव के बारे में कहा कि उन्हें कोई मंत्र नहीं दिया गया, बल्कि उन्होंने अपने भीतर प्रकाश और संगीत का अनुभव किया।

1926 में उनके गुरु ने उन्हें अन्य लोगों को यह ज्ञान सिखाने का आदेश दिया। इसके बाद लगभग 10 वर्षों तक उन्होंने भारत और वर्तमान पाकिस्तान के क्षेत्रों में यात्रा कर अपने उपदेशों का प्रचार किया।

संप्रदाय और प्रचार 

1936 में स्वामी स्वरूपानंद के निधन के बाद उनके उत्तराधिकार को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, क्योंकि हंस महाराज गृहस्थ थे। इसके बावजूद उन्होंने स्वतंत्र रूप से अपने गुरु के आशीर्वाद के साथ प्रचार कार्य जारी रखा।

उन्होंने नजीबाबाद (हरिद्वार के पास) में अपने उपदेश देना प्रारंभ किया। उनकी शिक्षाएँ आर्य समाज के समान समानता और सुधारवादी विचारों से प्रभावित थीं। वे बिना किसी भेदभाव के सभी जाति, धर्म और वर्ग के लोगों को अपना शिष्य बनाते थे, जो उस समय एक अनोखी बात थी।

इसी दौरान उन्होंने अपनी पहली पुस्तक “हंस योग प्रकाश” प्रकाशित की।

प्रचार का विस्तार 

हंस महाराज ने उत्तर भारत के गाँवों और शहरों में पैदल और रेल द्वारा यात्रा कर अपने उपदेश फैलाए।

  • वे रेलवे स्टेशनों और गाँवों में लोगों को संबोधित करते थे
  • दिल्ली और हरिद्वार के बीच लगातार यात्रा करते थे
  • 1944 में उन्होंने हरिद्वार के पास “प्रेम नगर” आश्रम की स्थापना की

बाद में उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी और उन्होंने अधिक लोगों तक पहुँचने के लिए अपनी गतिविधियों का विस्तार किया।

परिवार और उत्तराधिकार 

पहली पत्नी से उन्हें एक पुत्री (सवित्री) हुई, जबकि दूसरी पत्नी राजेश्वरी देवी (माता जी) से चार पुत्र हुए—सतपाल, महीपाल, धरमपाल और प्रेमपाल।

1966 में उनके निधन के बाद उनके सबसे छोटे पुत्र प्रेम रावत को “परफेक्ट मास्टर” के रूप में स्वीकार किया गया, हालांकि उनकी कम आयु के कारण परिवार ने मिलकर नेतृत्व संभाला।

बाद में संगठन में मतभेद उत्पन्न हुए और उनके बड़े पुत्र सतपाल को भारत में संगठन का प्रमुख बनाया गया।

डिवाइन लाइट मिशन

हंस महाराज ने अपने उपदेशों को फैलाने के लिए डिवाइन लाइट मिशन (DLM) की स्थापना की, जिसे 1960 में पंजीकृत किया गया।

इस मिशन का उद्देश्य था:

  • सभी धर्मों की एकता का संदेश देना
  • शांति और आत्मज्ञान को बढ़ावा देना
  • मानवता के लिए स्थायी शांति का मार्ग दिखाना

अंतिम समय 

1966 में अलवर यात्रा के दौरान वे बीमार पड़ गए और दिल्ली लौटने के बाद 19 जुलाई 1966 को उनका निधन हो गया।

उनकी अस्थियाँ हरिद्वार ले जाई गईं, जहाँ उनके अनुयायियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

Reference Wikipedia