जन्म: लगभग 1320
पंद्रेथन (वर्तमान श्रीनगर, जम्मू और कश्मीर, भारत)
मृत्यु: 1392 (आयु लगभग 71–72 वर्ष)
कश्मीर
अन्य नाम:
प्रसिद्धि: वाख (वात्सुन) काव्य
लल्लेश्वरी (लगभग 1320–1392), जिन्हें सामान्यतः लाल देद के नाम से जाना जाता है, कश्मीर शैव दर्शन की एक महान संत और रहस्यवादी (मिस्टिक) थीं।
वे “वात्सुन” या “वाख” नामक रहस्यवादी काव्य शैली की प्रवर्तक थीं, जिसका अर्थ है “वाणी”।
उनकी रचनाएँ कश्मीरी भाषा की प्रारंभिक साहित्यिक धरोहरों में शामिल हैं और आधुनिक कश्मीरी साहित्य के इतिहास का महत्वपूर्ण भाग हैं।
अधिकांश विद्वान उनके जन्म को 1301 से 1320 ईस्वी के बीच मानते हैं।
उनका जन्म कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
उनका विवाह 12 वर्ष की आयु में कर दिया गया, और विवाह के बाद उनका नाम “पद्मावती” रखा गया, लेकिन वे “लल्ला” या “लल्लेश्वरी” नाम से ही प्रसिद्ध रहीं।
कुछ कथाओं के अनुसार उनका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं था।
24–26 वर्ष की आयु में उन्होंने घर छोड़ दिया और एक शैव गुरु सिद्ध श्रीकंठ (या सेद बोयू) की शिष्या बन गईं।
उन्होंने आध्यात्मिक शिक्षा के दौरान:
बाद में वे स्वयं एक आध्यात्मिक गुरु बन गईं।
लल्लेश्वरी के जीवन के बारे में जानकारी मुख्यतः मौखिक परंपराओं पर आधारित है, इसलिए उनके जीवन के विवरण में विभिन्न मत पाए जाते हैं।
उनका पहला लिखित उल्लेख 1587 में “तजकिरत-उल-आरिफिन” ग्रंथ में मिलता है।
बाद में अन्य ग्रंथों और फारसी इतिहासों में भी उनका वर्णन किया गया।
लल्लेश्वरी और नुंद ऋषि (शेख नूर-उद-दीन नूरानी) के बीच गहरा आध्यात्मिक संबंध माना जाता है।
एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार:
तब लल्लेश्वरी ने कहा:
“जब जन्म लेने में शर्म नहीं, तो दूध पीने में क्यों?”
इसके बाद बालक ने दूध पीना शुरू कर दिया।
यह कथा उनके आध्यात्मिक प्रभाव को दर्शाती है।
दोनों संतों ने:
लल्लेश्वरी और नुंद ऋषि की शिक्षाओं ने कश्मीर में:
के समन्वय को बढ़ावा दिया।
उनकी शिक्षाओं ने:
का संदेश दिया और कश्मीर की “ऋषि परंपरा” की नींव रखी।
लल्लेश्वरी की रचनाएँ “वाख” के रूप में जानी जाती हैं।
उनके लगभग 285 वाख माने जाते हैं।
उनकी रचनाओं में:
का समन्वय दिखाई देता है।
उनकी रचनाएँ प्रारंभ में मौखिक रूप से प्रचलित थीं और बाद में लिखित रूप में संकलित की गईं।
1914 में जॉर्ज ग्रियर्सन ने उनके वाखों का संकलन और अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया।
इसके बाद कई विद्वानों ने उनके कार्यों का अनुवाद किया।
लल्लेश्वरी का कश्मीर की संस्कृति और आध्यात्मिकता पर गहरा प्रभाव पड़ा।
वे हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों द्वारा समान रूप से पूजनीय हैं।
उनकी शिक्षाएँ:
उनके जीवन और काव्य पर:
आधारित कई आधुनिक प्रस्तुतियाँ बनाई गई हैं।
उनकी रचनाएँ आज भी गाई और पढ़ी जाती हैं।
Reference Wikipedia