भगवान नित्यानंद
व्यक्तिगत जीवन
जन्म: रामन नायर
1897
टुनेरी, कोयिलांडी, मद्रास प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत (वर्तमान कोझिकोड जिला, केरल)
मृत्यु: 8 अगस्त 1961 (आयु 63 वर्ष)
गणेशपुरी, महाराष्ट्र, भारत
धार्मिक जीवन
धर्म: हिंदू धर्म
भगवान नित्यानंद (नवंबर/दिसंबर 1897 – 8 अगस्त 1961) एक भारतीय गुरु थे। उनकी शिक्षाएँ “चिदाकाश गीता” में संकलित हैं।
जीवनी (Biography)
बाल्यकाल (Childhood)
भगवान नित्यानंद के जन्म से संबंधित विवरण स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं हैं।
उनके शिष्यों के अनुसार, वे टुनेरी गाँव (कोयिलांडी) में एक परित्यक्त शिशु के रूप में पाए गए थे, जिन्हें उन्निअम्मा नायर नामक महिला ने अपनाया।
उन्निअम्मा नायर और उनके पति चाथु नायर ने इस बालक का पालन-पोषण अपने पाँच बच्चों के साथ किया।
उन्होंने इस बालक का नाम “रामन” रखा।
उनके पालक माता-पिता किसान थे और एक धनी वकील ईश्वर अय्यर की जमीन की देखभाल भी करते थे।
जब नित्यानंद तीन वर्ष के थे, तब उनके पालक पिता का निधन हो गया और छह वर्ष की आयु में उनकी पालक माता भी चल बसीं।
मृत्यु से पहले उनकी माता ने नित्यानंद की जिम्मेदारी ईश्वर अय्यर को सौंप दी।
आध्यात्मिक जीवन (Spiritual life)
गुरु नित्यानंद की समाधि
बचपन से ही भगवान नित्यानंद असाधारण आध्यात्मिक अवस्था में प्रतीत होते थे, जिससे यह विश्वास उत्पन्न हुआ कि वे जन्म से ही सिद्ध थे।
उन्हें “नित्यानंद” नाम दिया गया, जिसका अर्थ है “सदैव आनंद में रहने वाला।”
20 वर्ष की आयु से पहले ही वे एक भ्रमणशील योगी बन गए और हिमालय सहित कई स्थानों पर योग साधना की।
1920 तक वे दक्षिण भारत लौट आए।
दक्षिण भारत में बसने के बाद, वे चमत्कार करने और रोगियों को ठीक करने के लिए प्रसिद्ध हो गए।
उन्होंने केरल के कन्हंगड़ में एक आश्रम की स्थापना की। वहाँ का पहाड़ी मंदिर और आश्रम आज तीर्थ स्थल हैं।
गुरुवन नामक वन क्षेत्र, जहाँ उन्होंने तपस्या की थी, आज भी एक पवित्र स्थान है।
1923 तक वे महाराष्ट्र के तानसा घाटी क्षेत्र में पहुँचे, जहाँ उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई।
हालाँकि लोग उन्हें चमत्कारी मानते थे, लेकिन वे स्वयं कहते थे—
“जो कुछ भी होता है, वह भगवान की इच्छा से स्वतः होता है।”
उन्होंने स्थानीय आदिवासियों की सहायता की और एक विद्यालय की स्थापना की, जहाँ छात्रों को भोजन और वस्त्र प्रदान किए जाते थे।
गुरु (Guru)
एक गुरु के रूप में भगवान नित्यानंद ने बहुत कम मौखिक उपदेश दिए।
1920 के दशक में उनके भक्त संध्या समय उनके पास बैठते थे। वे प्रायः मौन रहते थे, लेकिन कभी-कभी उपदेश देते थे।
उनकी एक भक्त तुलसीअम्मा ने उनके उपदेशों और प्रश्नों के उत्तरों को लिखकर संकलित किया, जो बाद में “चिदाकाश गीता” के रूप में प्रकाशित हुए।
कुछ लोगों का मानना है कि नित्यानंद बिना शब्दों के भी आध्यात्मिक शक्ति (शक्तिपात) प्रदान कर सकते थे।
उनका व्यवहार कभी-कभी कठोर भी होता था, जैसे अनुचित उद्देश्य से आने वाले लोगों को दूर रखने के लिए वे पत्थर फेंक देते थे।
1936 में वे गणेशपुरी के शिव मंदिर में रहने लगे। वहाँ उनके लिए एक झोपड़ी बनाई गई, जो बाद में एक आश्रम में बदल गई।
उनके बढ़ते अनुयायियों के कारण यह स्थान एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र बन गया।
लोग उन्हें “अवधूत” मानते थे, अर्थात् वह व्यक्ति जो आध्यात्मिक रूप से पूर्णतः स्थित हो।
अंतिम वर्ष और मृत्यु (Final Years and Death)
भगवान नित्यानंद का निधन 8 अगस्त 1961 को हुआ।
उनकी समाधि गणेशपुरी में स्थित समाधि मंदिर में है, जो आज एक प्रमुख तीर्थ स्थल है।
गणेशपुरी के गुरुदेव सिद्ध पीठ आश्रम में भी उनका एक मंदिर है।
उनके जीवन से जुड़े आश्रम, भवन और अन्य स्थानों का संरक्षण “श्री भीमेश्वर सद्गुरु नित्यानंद संस्था” द्वारा किया जाता है।
कन्हंगड़ में स्थित आश्रम और मंदिरों की देखरेख एक अन्य ट्रस्ट द्वारा की जाती है, जो शैक्षणिक संस्थान और धर्मशाला भी संचालित करता है।
भगवान नित्यानंद के गुरु
मुंबई के बंट भवन में गुरु नित्यानंद की प्रतिमा
भगवान नित्यानंद के गुरु के विषय में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।
कुछ जीवनीकारों के अनुसार उनका कोई गुरु नहीं था, जबकि उनके शिष्य स्वामी मुक्तानंद के अनुसार उनके गुरु केरल के एक अज्ञात सिद्ध थे।
Reference Wikipedia