स्वामीनारायण

स्वामीनारायण

बीएपीएस (BAPS)
छपैया, अयोध्या (उत्तर प्रदेश, भारत)

Divine Journey & Teachings

स्वामीनारायण

परिचय

स्वामीनारायण (3 अप्रैल 1781 – 1 जून 1830), जिन्हें सहजानंद स्वामी के नाम से भी जाना जाता है, एक महान भारतीय योगी, सन्यासी और आध्यात्मिक गुरु थे। उनके अनुयायी उन्हें भगवान कृष्ण का अवतार या पुरुषोत्तम का सर्वोच्च स्वरूप मानते हैं। उनके द्वारा स्थापित “स्वामीनारायण संप्रदाय” आज भी भारत और विश्वभर में व्यापक रूप से प्रचलित है।

व्यक्तिगत जीवन

  • जन्म नाम: घनश्याम पांडे
  • जन्म: 3 अप्रैल 1781
  • जन्म स्थान: छपैया, अयोध्या (उत्तर प्रदेश, भारत)
  • मृत्यु: 1 जून 1830
  • मृत्यु स्थान: गढ़डा, गुजरात, भारत
  • धर्म: हिंदू धर्म
  • संप्रदाय के संस्थापक: स्वामीनारायण संप्रदाय
  • गुरु: स्वामी रामानंद
  • उत्तराधिकारी: अयोध्याप्रसाद और रघुवीरा

प्रारंभिक जीवन 

स्वामीनारायण का जन्म उत्तर प्रदेश के छपैया गाँव में हुआ। उनके पिता हरिप्रसाद पांडे (धर्मदेव) और माता प्रेमवती (भक्तिमाता) थे। उनका जन्म राम नवमी के दिन हुआ, इसलिए उनके अनुयायी इस दिन को स्वामीनारायण जयंती के रूप में भी मनाते हैं।

उनके दो भाई थे—रामप्रताप पांडे और इच्छाराम पांडे। बचपन से ही वे अत्यंत मेधावी थे और कहा जाता है कि उन्होंने सात वर्ष की आयु में ही वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों का अध्ययन कर लिया था।

नीलकंठ वर्णी के रूप में यात्राएँ 

माता-पिता के निधन के बाद, घनश्याम पांडे ने 11 वर्ष की आयु में 29 जून 1792 को घर त्याग दिया और “नीलकंठ वर्णी” नाम धारण किया। उन्होंने भारत और नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में यात्रा की, जहाँ वे ऐसे आश्रम की खोज में थे जो वेदांत, सांख्य, योग और पंचरात्र दर्शन का सही ज्ञान प्रदान करता हो।

अपनी यात्रा के दौरान वे पाँच प्रमुख प्रश्न पूछते थे:

  • जीव क्या है?
  • ईश्वर क्या है?
  • माया क्या है?
  • ब्रह्म क्या है?
  • परब्रह्म क्या है?

उन्होंने नेपाल में गोपाल योगी से नौ महीनों में अष्टांग योग का अभ्यास सीखा। कहा जाता है कि उन्होंने नेपाल के राजा राणा बहादुर शाह को रोगमुक्त किया, जिसके परिणामस्वरूप राजा ने बंदी बनाए गए साधुओं को मुक्त कर दिया।

उन्होंने पुरी के जगन्नाथ मंदिर, बद्रीनाथ, रामेश्वरम, नासिक, द्वारका और पंढरपुर जैसे प्रमुख तीर्थस्थलों की यात्रा की।

गुजरात आगमन और दीक्षा 

1799 में सात वर्षों की यात्रा के बाद नीलकंठ वर्णी गुजरात के जूनागढ़ जिले के लोज गाँव पहुँचे। वहाँ उनकी मुलाकात मुक्तानंद स्वामी से हुई, जो स्वामी रामानंद के शिष्य थे। मुक्तानंद स्वामी ने उनके प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर दिए, जिसके बाद नीलकंठ वर्णी वहीं रुक गए।

कुछ समय बाद उनकी मुलाकात स्वामी रामानंद से हुई, जिन्होंने उन्हें दीक्षा दी और “सहजानंद स्वामी” नाम प्रदान किया।

स्वामीनारायण संप्रदाय की स्थापना 

1802 में स्वामी रामानंद ने अपने निधन से पहले सहजानंद स्वामी को संप्रदाय का नेतृत्व सौंप दिया। इसके बाद सहजानंद स्वामी “स्वामीनारायण” के नाम से प्रसिद्ध हुए और उनके अनुयायियों ने उनके नाम पर संप्रदाय को “स्वामीनारायण संप्रदाय” कहा।

उन्होंने अपने अनुयायियों को “स्वामीनारायण मंत्र” का उपदेश दिया और नैतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक सुधारों पर जोर दिया।

सामाजिक सुधार और शिक्षाएँ 

स्वामीनारायण ने अहिंसा, नैतिकता और सामाजिक सुधारों पर विशेष बल दिया। उन्होंने महिलाओं और गरीबों के उत्थान के लिए कार्य किए तथा बड़े पैमाने पर अहिंसक यज्ञों का आयोजन किया।

उन्होंने अपने जीवनकाल में छह प्रमुख मंदिरों का निर्माण करवाया और भक्तों को भक्ति मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया।

ग्रंथ और संगठन 

1826 में उन्होंने “शिक्षापत्री” नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें उनके उपदेशों और जीवन के नियमों का वर्णन है।

उन्होंने “लक्ष्मी नारायण देव गादी” (वडताल) और “नर नारायण देव गादी” (अहमदाबाद) नामक दो प्रमुख धार्मिक व्यवस्थाओं की स्थापना की, जिनका नेतृत्व आचार्यों द्वारा किया जाता है।

सहजानंद स्वामी के रूप में नेतृत्व 

नीलकंठ वर्णी की आध्यात्मिक समझ, विशेष रूप से पंचतत्त्व (पाँच शाश्वत तत्वों) के ज्ञान तथा उनके मानसिक और शारीरिक अनुशासन से स्वामी रामानंद के वरिष्ठ शिष्य अत्यंत प्रभावित हुए। 20 अक्टूबर 1800 को नीलकंठ वर्णी ने स्वामी रामानंद से संन्यास दीक्षा प्राप्त की और उन्हें “सहजानंद स्वामी” तथा “नारायण मुनि” नाम प्रदान किया गया।

21 वर्ष की आयु में सहजानंद स्वामी को स्वामी रामानंद द्वारा उद्धव संप्रदाय का उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया। प्रारंभ में कुछ लोगों ने इसका विरोध किया, लेकिन शीघ्र ही उन्हें संप्रदाय के नेता के रूप में स्वीकार कर लिया गया। बाद में यही संप्रदाय “स्वामीनारायण संप्रदाय” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

उन्होंने एकमात्र ईश्वर—कृष्ण या नारायण—की उपासना पर बल दिया और उन्हें अपना इष्टदेव माना। उन्होंने भक्ति को शुद्ध और अनुशासित रूप में प्रस्तुत किया तथा भोग-विलास से दूर रहकर भगवान की महिमा के साथ आराधना करने का मार्ग दिखाया।

स्वामीनारायण रूप की मान्यता 

स्वामीनारायण परंपरा के अनुसार, सहजानंद स्वामी को बाद में “स्वामीनारायण” के नाम से जाना जाने लगा, जब उन्होंने अपने अनुयायियों को “स्वामीनारायण मंत्र” का उपदेश दिया। इस मंत्र के जप से अनेक भक्तों को समाधि जैसी अवस्था का अनुभव हुआ और उन्होंने अपने आराध्य देवताओं के दर्शन होने का दावा किया।

उनके कुछ अनुयायी उन्हें भगवान का अवतार मानते हैं—विशेष रूप से कृष्ण या पुरुषोत्तम नारायण का पूर्ण अवतार। उनके जीवन और कथाओं में भगवान कृष्ण के जीवन से कई समानताएँ भी बताई जाती हैं।

हालाँकि, इस विश्वास को लेकर कुछ आलोचनाएँ भी हुईं। कुछ लोगों ने उनके द्वारा स्वीकार किए गए दान और उनके राजसी जीवनशैली पर प्रश्न उठाए। इसके उत्तर में स्वामीनारायण ने कहा कि वे यह सब अपने अनुयायियों के कल्याण और मुक्ति के लिए स्वीकार करते हैं।

शिक्षाएँ 

स्वामीनारायण ने अपने अनुयायियों को भक्ति और धर्म का पालन करते हुए एक सदाचारी जीवन जीने की प्रेरणा दी। उन्होंने एक मजबूत धार्मिक संगठन की स्थापना की, जो हिंदू ग्रंथों और परंपराओं पर आधारित था।

उन्होंने अपने अनुयायियों को कई सामाजिक और नैतिक नियमों का पालन करने के लिए प्रेरित किया, जैसे—

  • मांस, शराब और नशे का त्याग
  • व्यभिचार और अपराधों से दूर रहना
  • अहिंसा का पालन
  • भूत-प्रेत और तांत्रिक क्रियाओं से दूरी

उन्होंने यह भी कहा कि मोक्ष प्राप्त करने के लिए चार मुख्य तत्व आवश्यक हैं—
👉 धर्म (सत्य आचरण)
👉 भक्ति (ईश्वर के प्रति प्रेम)
👉 ज्ञान (आध्यात्मिक समझ)
👉 वैराग्य (त्याग)

दर्शन 

स्वामीनारायण का दर्शन वैष्णव परंपरा के निकट था और वे रामानुजाचार्य के विचारों से प्रभावित थे। उन्होंने अद्वैत वेदांत के कुछ सिद्धांतों की आलोचना की और यह माना कि परमात्मा सगुण (रूपयुक्त) है, अर्थात् भगवान का दिव्य स्वरूप होता है।

उनके अनुसार परब्रह्म और अक्षरब्रह्म दो अलग-अलग शाश्वत तत्व हैं, और ईश्वर सदा साकार रूप में विद्यमान रहता है।

अन्य धर्मों और ब्रिटिश शासन से संबंध 

स्वामीनारायण ने अन्य धर्मों के लोगों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे। उनके अनुयायियों में मुस्लिम और पारसी समुदाय के लोग भी शामिल थे। उन्होंने विभिन्न धार्मिक नेताओं से संवाद किया और सभी धर्मों के प्रति सम्मान का भाव रखा।

ब्रिटिश शासन के साथ भी उनके अच्छे संबंध थे। अहमदाबाद में उनके द्वारा निर्मित पहला मंदिर ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई भूमि पर बनाया गया था।

उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों के साथ बैठकें भी कीं और समाज में शांति एवं स्थिरता बनाए रखने में योगदान दिया।

स्थानीय काठी शासकों से संबंध (Relations with Kathi Rulers)

स्वामीनारायण ने काठियावाड़ के काठी शासकों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए। उन्होंने उनकी भाषा, वेशभूषा और परंपराओं को अपनाया, जिसके कारण उन्हें “काठिया भगवान” कहा जाने लगा।

काठी शासकों ने उन्हें विरोधियों से सुरक्षा प्रदान की और मंदिर निर्माण के दौरान आने वाली बाधाओं को दूर करने में सहायता की। इस प्रकार उन्होंने स्वामीनारायण के कार्यों को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मंदिर और संन्यासी 

स्वामीनारायण ने अनेक हिंदू मंदिरों के निर्माण का आदेश दिया और अपने जीवनकाल में छह भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया। इन मंदिरों में उन्होंने विभिन्न देवताओं—जैसे राधा-कृष्ण, नर-नारायण, लक्ष्मी-नारायण, गोपीनाथ, राधा रमण और मदनमोहन—की मूर्तियों की स्थापना की। इन मंदिरों की मूर्तियाँ विशेष रूप से भगवान कृष्ण की महिमा को दर्शाती हैं।

स्वामीनारायण के शिष्यों ने अनेक भक्ति गीत और कविताएँ रचीं, जिन्हें आज भी त्योहारों और धार्मिक अवसरों पर गाया जाता है। उन्होंने अपने अनुयायियों के बीच उपवास और भक्ति की परंपरा को भी प्रोत्साहित किया। उन्होंने वसंत पंचमी, होली और जन्माष्टमी जैसे त्योहारों का आयोजन पारंपरिक रास नृत्य के साथ किया।

स्वामीनारायण द्वारा निर्मित पहला मंदिर 1822 में अहमदाबाद में बनाया गया, जिसके लिए भूमि ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान की गई थी। इसके बाद 1822 में भुज, 1824 में वडताल, 1826 में धोलेरा, 1828 में जूनागढ़ और गढ़डा में मंदिरों का निर्माण हुआ। इसके अतिरिक्त उन्होंने मूली, धोळका और जेतलपुर में भी मंदिर निर्माण का आदेश दिया।

स्वामीनारायण संप्रदाय में प्रारंभ से ही संन्यासियों (साधुओं) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ये साधु समाज में धर्म और नैतिक जीवन को बढ़ावा देते हैं। परंपरा के अनुसार, स्वामीनारायण ने एक ही रात में 500 संन्यासियों को “परमहंस” की उपाधि दी थी, जो संन्यासियों का सर्वोच्च स्तर माना जाता है।

प्रमुख परमहंसों में मुक्तानंद स्वामी, गोपालानंद स्वामी, ब्रह्मानंद स्वामी, गुणातीतानंद स्वामी, प्रेमानंद स्वामी, निष्कुलानंद स्वामी और नित्यानंद स्वामी शामिल हैं।

अहमदाबाद और वडताल गादी 

अपने जीवन के अंतिम समय में स्वामीनारायण ने अपने संप्रदाय के संचालन के लिए आचार्यों की परंपरा स्थापित करने का निर्णय लिया। उन्होंने 21 नवंबर 1825 को दो प्रमुख गादियों (नेतृत्व केंद्रों) की स्थापना की—एक अहमदाबाद (नर-नारायण देव गादी) और दूसरी वडताल (लक्ष्मी-नारायण देव गादी)।

उन्होंने अपने दोनों भाइयों के पुत्रों को गोद लेकर उन्हें इन गादियों का आचार्य नियुक्त किया। अयोध्याप्रसाद (रामप्रताप के पुत्र) को अहमदाबाद गादी का आचार्य बनाया गया और रघुवीरा (इच्छाराम के पुत्र) को वडताल गादी का आचार्य नियुक्त किया गया।

स्वामीनारायण ने यह भी निर्धारित किया कि यह पद वंशानुगत होगा, जिससे आचार्य परंपरा उनके परिवार के माध्यम से आगे बढ़ती रहे।

उन्होंने अपने अनुयायियों को निर्देश दिया कि वे आचार्यों के साथ-साथ गोपालानंद स्वामी का भी सम्मान और पालन करें, जिन्हें संप्रदाय का प्रमुख स्तंभ माना जाता था।

मृत्यु 

1830 में स्वामीनारायण ने अपने अनुयायियों को एकत्रित किया और अपने प्रस्थान की घोषणा की। इसके पश्चात 1 जून 1830 (जेठ सुद 10, संवत 1886) को उनका निधन हुआ। अनुयायियों का विश्वास है कि उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर अक्षरधाम को प्रस्थान किया, जो उनका दिव्य निवास स्थान माना जाता है। उनका अंतिम संस्कार गढ़डा के लक्ष्मी वाड़ी में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार किया गया।

सामाजिक विचार 

महिलाएँ

स्वामीनारायण ने महिलाओं की शिक्षा को प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार माना, यद्यपि उस समय समाज में इसका विरोध था। उनके प्रभाव से महिलाओं की साक्षरता दर में वृद्धि हुई और वे आध्यात्मिक विषयों पर प्रवचन देने लगीं। उन्हें भारत में महिला शिक्षा के अग्रदूतों में से एक माना जाता है।

उन्होंने सती प्रथा का विरोध किया और इसे आत्महत्या के समान बताया। उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या को पाप कहा और दहेज प्रथा को कम करने के लिए भी प्रयास किए। हालांकि, उन्होंने अपने संप्रदाय के साधु-साध्वियों के लिए विपरीत लिंग से पूर्ण दूरी बनाए रखने का कठोर नियम भी लागू किया।

कुछ नियमों—जैसे मंदिरों में महिलाओं के लिए अलग स्थान और मासिक धर्म के दौरान प्रतिबंध—को लेकर आलोचना भी हुई। विधवाओं के लिए उन्होंने पुनर्विवाह की अनुमति दी, लेकिन कुछ परिस्थितियों में कठोर सामाजिक नियम भी निर्धारित किए।

जाति व्यवस्था और गरीब

स्वामीनारायण ने गरीबों की सहायता के लिए भोजन और पानी वितरित किया तथा सामाजिक सेवा कार्यों का आयोजन किया। उन्होंने अकाल के समय लोगों की सहायता भी की।

उन्होंने जाति व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में कुछ प्रयास किए और निम्न वर्ग के लोगों को अपने संप्रदाय में शामिल किया। हालांकि, कुछ सामाजिक प्रथाओं—जैसे भोजन और शुद्धता संबंधी नियम—को उन्होंने बनाए रखा।

उन्होंने निम्न वर्ग के लोगों को अपने अनुयायियों में शामिल किया और उन्हें सामाजिक सम्मान दिलाने का प्रयास किया, लेकिन कुछ स्थानों पर मंदिरों में प्रवेश को लेकर सीमाएँ भी बनी रहीं।

पशु बलि और यज्ञ

स्वामीनारायण पशु बलि के विरोधी थे। उन्होंने बड़े स्तर पर यज्ञों का आयोजन किया और उनमें अहिंसा (अहिंसा सिद्धांत) को पुनः स्थापित किया। उन्होंने अपने अनुयायियों को शाकाहार अपनाने के लिए प्रेरित किया और मांसाहार को निषिद्ध किया।

ग्रंथ 

स्वामीनारायण ने हिंदू धर्म के सामान्य ग्रंथों—जैसे भागवत पुराण—को उच्च स्थान दिया, लेकिन उनके संप्रदाय में कुछ विशेष ग्रंथ भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इनमें शिक्षापत्री, वचनामृत, सत्संगी जीवन, मुक्तानंद काव्य, निष्कुलानंद काव्य और भक्त चिंतामणि प्रमुख हैं।

शिक्षापत्री 

स्वामीनारायण ने 11 फरवरी 1826 को “शिक्षापत्री” नामक ग्रंथ की रचना की। यह 212 संस्कृत श्लोकों का एक संक्षिप्त ग्रंथ है, जिसमें उनके अनुयायियों के लिए नैतिक और सामाजिक नियमों का वर्णन किया गया है। यह ग्रंथ उनके संप्रदाय में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और अनुशासित जीवन जीने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है।

वचनामृत 

“वचनामृत” स्वामीनारायण के 1819 से 1829 के बीच दिए गए 273 प्रवचनों का संग्रह है। इसे उनके चार प्रमुख शिष्यों द्वारा संकलित किया गया था और स्वामीनारायण ने स्वयं इसकी समीक्षा की थी।

यह ग्रंथ उनके संप्रदाय का प्रमुख दार्शनिक आधार माना जाता है और अनुयायी इसे ईश्वर की प्रत्यक्ष वाणी के रूप में मानते हैं। इसमें उपनिषद, भगवद गीता और अन्य हिंदू ग्रंथों की व्याख्या प्रस्तुत की गई है।

सत्संगी जीवन

“सत्संगी जीवन” स्वामीनारायण की अधिकृत जीवनी है, जिसे शतानंद स्वामी ने लिखा। इसमें उनके जीवन, शिक्षाओं और आध्यात्मिक कार्यों का विस्तृत वर्णन है।

स्वामीनारायण ने स्वयं इस ग्रंथ की पुष्टि की थी और अपने अनुयायियों को इसे पढ़ने तथा सुनने के लिए प्रेरित किया।

विरासत 

विभाजन 

स्वामीनारायण के निधन के बाद उनके संप्रदाय में विभिन्न मतभेदों के कारण कई शाखाएँ बनीं। इनमें प्रमुख हैं—BAPS (बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था) और मणिनगर स्वामीनारायण गादी संस्थान।

इन शाखाओं के अनुयायियों के बीच उत्तराधिकार को लेकर अलग-अलग मान्यताएँ हैं, जैसे कुछ लोग गुणातीतानंद स्वामी को आध्यात्मिक उत्तराधिकारी मानते हैं, जबकि अन्य गोपालानंद स्वामी को उत्तराधिकारी मानते हैं।

विकास 

स्वामीनारायण के निधन के समय उनके लगभग 18 लाख अनुयायी थे। समय के साथ यह संख्या बढ़ती गई और 21वीं सदी में उनके अनुयायियों की संख्या विश्वभर में करोड़ों में पहुँच गई।

आज उनके केंद्र विश्व के विभिन्न महाद्वीपों में स्थापित हैं, विशेष रूप से गुजरात में उनका व्यापक प्रभाव है।

स्वीकृति और आलोचना 

स्वामीनारायण की शिक्षाओं और उनके अनुयायियों द्वारा उन्हें भगवान का स्वरूप मानने की धारणा की आलोचना भी हुई। दयानंद सरस्वती जैसे सुधारकों ने उनके विचारों पर प्रश्न उठाए और उन्हें वैदिक परंपरा से अलग बताया।

महात्मा गांधी ने भी प्रारंभ में उनके विचारों से असहमति व्यक्त की, लेकिन बाद में उनके सामाजिक सुधारों और कार्यों की सराहना की।

Reference Wikipedia