श्री स्वामी केशवानंद सत्यार्थी जी महाराज एक भारतीय आध्यात्मिक गुरु थे, जो श्री नांगली साहिब परंपरा से जुड़े थे। वे “परमहंस सत्यार्थी मिशन” के प्रमुख और संरक्षक संत थे। वर्ष 1985 में उन्हें श्री परमहंस स्वामी रामानंद सत्यार्थी जी महाराज द्वारा अपना आध्यात्मिक उत्तराधिकारी घोषित किया गया। उन्होंने विश्वभर में यात्रा कर आध्यात्मिकता और आत्मज्ञान का प्रचार किया तथा विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं का संचालन भी किया।
स्वामी केशवानंद सत्यार्थी जी महाराज का जन्म एक धार्मिक परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित खुशीराम भारद्वाज संस्कृत, ज्योतिष, वेदांत, शास्त्र और उपनिषद के विद्वान थे और भगवान कृष्ण के भक्त थे।
बाल्यकाल से ही उनमें आध्यात्मिक प्रवृत्ति दिखाई देने लगी थी और कम आयु में ही वे समाधि अवस्था में प्रवेश करने में सक्षम थे। उन्होंने अपनी शिक्षा के साथ-साथ राजयोग का अभ्यास जारी रखा और बाद में स्नातकोत्तर (M.A.) की उपाधि प्राप्त की।
उन्होंने स्वामी रामानंद सत्यार्थी जी महाराज से राजयोग का ज्ञान प्राप्त किया। 2 जुलाई 1985 (व्यास पूजा) के दिन उन्हें आध्यात्मिक उत्तराधिकारी घोषित किया गया और उनका नाम “स्वामी केशवानंद सत्यार्थी” रखा गया।
8 जनवरी 1995 को उन्होंने अपनी पत्नी संत माँ दिव्यानंद सत्यार्थी जी के साथ संन्यास ग्रहण किया और परमाहंस परंपरा के ज्ञान का प्रचार-प्रसार करने का संकल्प लिया। उन्होंने दिल्ली, हरिद्वार, लखनऊ और छतरपुर आदि स्थानों पर सत्यार्थी धाम (आश्रम) स्थापित किए और नियमित रूप से ज्ञान यज्ञ तथा आध्यात्मिक शिविरों का आयोजन किया।
परमहंस सत्यार्थी मिशन एक आध्यात्मिक संस्था है, जिसकी स्थापना स्वामी रामानंद सत्यार्थी जी महाराज द्वारा की गई थी और बाद में इसका संचालन स्वामी केशवानंद सत्यार्थी जी महाराज ने किया। इस मिशन के अंतर्गत स्वामी रामानंद सत्यार्थी ट्रस्ट, सत्यार्थी हाई स्कूल, सत्यार्थी सेवदल और “सत्यार्थी संदेश” पत्रिका जैसी संस्थाएँ संचालित की जाती थीं।
स्वामी केशवानंद सत्यार्थी जी महाराज की शिक्षाएँ भक्ति, सेवा (सेवा), प्रेम और राजयोग (ध्यान) पर आधारित थीं। उनका मिशन “वसुधैव कुटुंबकम” के सिद्धांत में विश्वास करता है। वे अद्वैत वेदांत, आत्मज्ञान (आत्म साक्षात्कार) और ध्यान साधना के महत्व पर विशेष जोर देते थे।
उनके अनुसार अद्वैत वेदांत का अर्थ है कि आत्मा (आत्मन) और ब्रह्म एक ही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि मोक्ष इसी जीवन में प्राप्त किया जा सकता है और इसके लिए ध्यान तथा आत्मज्ञान आवश्यक है।
राजयोग को “रॉयल योग”, “सहज मार्ग”, “सुरत शब्द योग” आदि नामों से भी जाना जाता है। यह एक आंतरिक ध्यान साधना है, जिसका लक्ष्य समाधि प्राप्त करना है। स्वामी केशवानंद सत्यार्थी जी महाराज अपने शिष्यों को “पवित्र नाम” (मंत्र) की साधना कराते थे, जिसे उपदेश के रूप में दिया जाता था।
उनके अनुसार यह साधना व्यक्ति को जीवन की कठिनाइयों से मुक्त कर सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। उन्नत स्तर की साधना को “सहज समाधि विज्ञान” कहा जाता है।
उनके अनुसार सेवा ही भक्ति का सर्वोत्तम रूप है। सेवा विभिन्न प्रकार से की जा सकती है, जैसे मंदिरों में सहयोग करना, घर पर पूजा करना या समाज के उत्थान के लिए दान देना। उन्होंने सेवा को आध्यात्मिक उन्नति का एक महत्वपूर्ण माध्यम बताया।
भक्ति का अर्थ है भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रेम। भक्ति योग के माध्यम से साधक अपने आराध्य के प्रति निरंतर स्मरण और प्रेम की भावना बनाए रखता है और संसार को ईश्वर का ही स्वरूप मानता है।
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