रविदास

रविदास

डेरा सचखंड बल्लां , जालंधर , पंजाब
बनारस, दिल्ली सल्तनत (वर्तमान वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत)

Divine Journey & Teachings

रविदास

व्यक्तिगत जीवन

जन्म:
बनारस, दिल्ली सल्तनत
(वर्तमान वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत)

मृत्यु:
बनारस, दिल्ली सल्तनत
(वर्तमान वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत)

पत्नी: लोना देवी
संतान: 1

अन्य नाम: रैदास, रोहिदास, रुही दास, रोबिदास, भगत रविदास, गुरु रविदास

व्यवसाय: कवि, चमड़ा कारीगर, सतगुरु (आध्यात्मिक शिक्षक)

परिचय

रविदास (या रैदास) 15वीं–16वीं शताब्दी के भक्ति आंदोलन के एक महान भारतीय संत, कवि और समाज सुधारक थे।

वे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में गुरु के रूप में पूजनीय हैं।

उन्होंने समाज में व्याप्त जाति और लिंग भेद को समाप्त करने का संदेश दिया और आध्यात्मिक स्वतंत्रता के लिए एकता पर जोर दिया।

धार्मिक महत्व

रविदास के भक्ति पद सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं।

हिंदू धर्म की दादूपंथी परंपरा के पंचवाणी ग्रंथ में भी उनकी रचनाएँ मिलती हैं।

वे रविदासिया धर्म आंदोलन के प्रमुख व्यक्तित्व माने जाते हैं।

तिथियाँ (Dates)

रविदास के जीवन की तिथियाँ निश्चित नहीं हैं।

कुछ विद्वानों के अनुसार—

  • जन्म: 1433 ई.
  • मृत्यु: 1528 ई.

जबकि अन्य मतों के अनुसार—

  • जन्म: 1377 ई.
  • मृत्यु: 1528 ई.

कुछ अन्य विद्वान इससे भी भिन्न तिथियाँ बताते हैं।

मीराबाई से संबंध

भक्ति संत मीराबाई को रविदास का शिष्य माना जाता है।

इससे यह संकेत मिलता है कि रविदास 15वीं–16वीं शताब्दी में सक्रिय थे।

नामों में क्षेत्रीय भिन्नता

रविदास को विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है—

  • रविदास – हिंदी क्षेत्रों में
  • रामदास – पाकिस्तान से आए अनुयायियों में
  • रैदास – उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश में
  • रुहिदास / रुईदास – बंगाल में
  • रोहिदास – महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात में

अनुयायियों के नाम

रविदास के अनुयायी भी विभिन्न नामों से जाने जाते हैं—

  • रविदासिया – सबसे सामान्य नाम
  • रामदासिया – पंजाब में
  • रोहिदासी – महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान में
  • रविवेद – मॉरीशस में

 

जीवन परिचय

जन्म और परिवार

रविदास का जन्म वाराणसी के पास सीर गोवर्धनपुर गाँव में हुआ था।

यह स्थान आज श्री गुरु रविदास जन्म स्थान के रूप में प्रसिद्ध है।

उनके माता-पिता थे—

  • माता: कलसी
  • पिता: संतोक दास

वे चमार (चमड़ा कार्य करने वाली) जाति से संबंधित थे।

जीवन और कार्य

उनका प्रारंभिक व्यवसाय चमड़े का कार्य था, लेकिन वे धीरे-धीरे आध्यात्मिक साधना की ओर आकर्षित हुए।

वे गंगा के तट पर ध्यान और साधना करते थे तथा संतों, सूफियों और साधुओं के साथ समय बिताते थे।

विवाह

12 वर्ष की आयु में उनका विवाह लोना देवी से हुआ।

उनका एक पुत्र था, जिसका नाम विजय दास था।

गुरु और परंपरा

मध्यकालीन ग्रंथों के अनुसार रविदास, भक्ति संत रामानंद के शिष्य थे।

उन्हें संत कबीर का समकालीन भी माना जाता है।

आध्यात्मिक विचार

रविदास ने—

  • सगुण (मूर्ति आधारित) भक्ति का त्याग किया
  • निर्गुण (निराकार) ईश्वर की उपासना पर जोर दिया

उन्होंने कहा कि—
👉 ईश्वर निराकार है
👉 और हर व्यक्ति उसे सीधे अनुभव कर सकता है

यात्रा और प्रभाव

रविदास ने भारत के विभिन्न तीर्थ स्थलों की यात्रा की, जैसे—

  • आंध्र प्रदेश
  • महाराष्ट्र
  • गुजरात
  • राजस्थान
  • हिमालय क्षेत्र

उनकी शिक्षाओं से विभिन्न वर्गों के लोग प्रभावित हुए।

गुरु नानक से संबंध

अधिकांश विद्वानों का मानना है कि रविदास की मुलाकात सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक से हुई थी।

उनके 41 पद गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं, जो उनकी शिक्षाओं का प्रमुख प्रमाण हैं।

ग्रंथ और स्रोत

रविदास के जीवन के बारे में जानकारी निम्न ग्रंथों से मिलती है—

  • अनंतदास की परचई
  • भक्तमाल (नाभादास)
  • प्रेमाम्बोध (सिख परंपरा)

हालाँकि, उनके जीवन से संबंधित अधिकांश ग्रंथ उनकी मृत्यु के लगभग 400 वर्ष बाद लिखे गए।

साहित्यिक रचनाएँ

रविदास की साहित्यिक कृतियों के सबसे प्राचीन प्रमाण आदि ग्रंथ और हिंदू दादूपंथी परंपरा के पंचवाणी ग्रंथ में मिलते हैं।

आदि ग्रंथ में रविदास के 41 पद शामिल हैं, और वे सिख धर्म के इस प्रमुख ग्रंथ के 36 योगदानकर्ताओं में से एक हैं।

काव्य के विषय

आदि ग्रंथ में संकलित उनकी कविताएँ कई महत्वपूर्ण विषयों को प्रस्तुत करती हैं, जैसे—

  • अन्याय और अत्याचार का सामना
  • युद्ध और उसके समाधान
  • सत्य के लिए जीवन समर्पित करने की भावना
  • समानता पर आधारित आदर्श राज्य की परिकल्पना

उन्होंने ऐसे समाज की कल्पना की जहाँ—
👉 कोई भी व्यक्ति दूसरे या तीसरे दर्जे का नागरिक न हो
👉 सभी को समान अधिकार प्राप्त हों

उनकी कविताओं में यह भी बताया गया है—
👉 सच्चा योगी कौन होता है
👉 वैराग्य (निष्पृहता) का महत्व क्या है

काव्य की प्रामाणिकता

विद्वान जेफ्री एब्बेसन के अनुसार—

जैसे अन्य भक्ति संत-कवियों के साथ हुआ, वैसे ही कई बाद के कवियों द्वारा लिखी गई रचनाएँ भी रविदास के नाम से जोड़ दी गईं।

👉 यह सम्मान और श्रद्धा के कारण किया गया
👉 लेकिन उन सभी रचनाओं का वास्तविक संबंध रविदास से नहीं है

प्रतीकात्मकता और साहित्य

विद्वान पीटर फ्राइडलैंडर के अनुसार, रविदास की जीवन-कथाएँ (हैजियोग्राफी) भले ही उनके निधन के बाद लिखी गई हों, लेकिन वे उस समय के भारतीय समाज के संघर्षों को दर्शाती हैं।

सामाजिक और धार्मिक संघर्ष

इन कथाओं में कई स्तरों पर संघर्ष दिखाई देता है—

1. सामाजिक संघर्ष

👉 रूढ़िवादी ब्राह्मण परंपरा और अन्य समुदायों के बीच टकराव

2. धार्मिक संघर्ष

👉 विभिन्न धर्मों और समुदायों के बीच मतभेद
👉 साथ ही सामाजिक एकता की खोज

3. आध्यात्मिक संघर्ष

👉 व्यक्ति के भीतर आत्मज्ञान प्राप्त करने की यात्रा

ऐतिहासिक प्रमाण

इन कथाओं की ऐतिहासिक सत्यता के स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

इनमें—

  • ब्राह्मणों के साथ संघर्ष
  • या मुस्लिम शासक सिकंदर लोदी के साथ विवाद

जैसी घटनाएँ शामिल हैं, लेकिन ये अधिकतर लोककथाएँ मानी जाती हैं।

चमत्कार और कथाएँ

इन कहानियों में रविदास को चमत्कारों के माध्यम से विजयी दिखाया गया है, जैसे—

  • पत्थर को पानी में तैराना
  • गंगा नदी का उल्टी दिशा में बहना

फ्राइडलैंडर के अनुसार, ये कथाएँ 17वीं से 20वीं शताब्दी के सामाजिक परिवेश को दर्शाती हैं।

सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ

विद्वान डेविड लॉरेनज़ेन के अनुसार—

रविदास से संबंधित कई रचनाएँ और कथाएँ—
👉 ब्राह्मणवाद के विरोध
👉 और सामुदायिक भेदभाव के खिलाफ

मजबूत विचार प्रस्तुत करती हैं।

ये कथाएँ उस समय के सामाजिक और राजनीतिक हालात को दर्शाती हैं, जब—

  • भारत इस्लामी शासन के अधीन था
  • और बाद में औपनिवेशिक शासन आया

इन परिस्थितियों में समाज के वंचित वर्गों ने अपने अधिकारों और पहचान के लिए आवाज उठाई।

दर्शन (Philosophy)

रविदास की वाणी में निर्गुण और सगुण भक्ति दोनों के तत्व मिलते हैं, साथ ही यह हिंदू धर्म के नाथ योग दर्शन से भी संबंधित विचारों को दर्शाती है।

वे अक्सर “सहज” शब्द का प्रयोग करते हैं, जिसका अर्थ एक ऐसी आध्यात्मिक अवस्था है जहाँ अनेकता और एकता का अनुभव एक साथ होता है।

भक्ति और आध्यात्मिक अनुभव

रविदास कहते हैं—

“मैं क्या गाऊँ?
गाते-गाते मैं थक गया हूँ।

कब तक विचार करूँ और कहूँ—
आत्मा को आत्मा में लीन कर दो।

यह अनुभव ऐसा है,
जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

मैंने प्रभु को पा लिया है—
अब मुझे कोई क्या हानि पहुँचा सकता है?”

उन्होंने यह भी कहा—
👉 हर वस्तु में भगवान हैं
👉 और जो इसे जान लेता है, वह स्वयं उसी में लीन हो जाता है

निर्गुण भक्ति

विद्वान डेविड लॉरेनज़ेन के अनुसार, रविदास की कविताएँ ईश्वर के प्रति असीम प्रेम और भक्ति को दर्शाती हैं, जहाँ ईश्वर को निर्गुण (निराकार) रूप में देखा गया है।

सिख परंपरा में भी गुरु नानक की वाणी और रविदास की भक्ति विचारधारा में समानता पाई जाती है।

अधिकांश आधुनिक विद्वान रविदास के दर्शन को निर्गुण भक्ति परंपरा का हिस्सा मानते हैं।

ब्रह्म और ईश्वर की अवधारणा

कुछ ग्रंथों में कबीर और रविदास के बीच ब्रह्म के स्वरूप पर संवाद का उल्लेख मिलता है।

  • कबीर → ब्रह्म को एक निराकार, अद्वैत (एकत्व) मानते हैं
  • रविदास → ब्रह्म को साकार (व्यक्तिगत ईश्वर) रूप में भी स्वीकार करते हैं

अंततः यह निष्कर्ष निकलता है कि—
👉 दोनों दृष्टिकोण एक ही सत्य के विभिन्न रूप हैं

दर्शन के दो दृष्टिकोण

विद्वान रविंद्र खरे के अनुसार, रविदास के दर्शन के दो अलग-अलग रूप सामने आते हैं—

1. पारंपरिक दृष्टिकोण (भक्तमाल)

भक्तमाल ग्रंथ के अनुसार—

  • रविदास मधुर वाणी वाले संत थे
  • वे सभी के आध्यात्मिक प्रश्नों का समाधान करते थे
  • उन्होंने अपने निम्न जाति के जन्म को स्वीकार किया
  • उनके विचार वेदों और प्राचीन ग्रंथों के अनुरूप थे

👉 वे अद्वैत दर्शन को मानते थे
👉 और बिना भेदभाव के सभी को ज्ञान देते थे

2. आधुनिक (दलित) दृष्टिकोण

20वीं शताब्दी के दलित समुदाय के अनुसार—

  • रविदास ने वेदों का विरोध किया
  • वे जाति प्रथा के खिलाफ थे
  • उन्होंने मूर्ति पूजा को अस्वीकार किया

कुछ मान्यताओं के अनुसार—
👉 वे सगुण भक्ति के समर्थक थे
👉 जबकि अन्य मानते हैं कि वे निर्गुण भक्ति के अनुयायी थे

गुरु ग्रंथ साहिब में विचार

गुरु ग्रंथ साहिब में रविदास के एक पद में कहा गया है—

“वेद और पुराण सुनने के बाद भी संदेह बना रहता है।

मन में अहंकार और पाप भरे हैं,
तो केवल स्नान करने से शुद्धि कैसे होगी?

यह वैसा ही है जैसे हाथी स्नान के बाद फिर धूल में लोट जाए।”

गुरु और शिष्य संबंध

रविदास के गुरु रामानंद ब्राह्मण थे और उनकी शिष्या मीराबाई एक राजपूत राजकुमारी थीं।

यह दर्शाता है कि—
👉 उनकी शिक्षाएँ जाति और वर्ग से परे थीं

विरासत (Legacy)

रविदासिया परंपरा

रविदास के अनुयायियों को रविदासिया कहा जाता है।

आज यह एक अलग धार्मिक पहचान के रूप में विकसित हो चुका है।

आधुनिक विकास

2009 में वियना में एक मंदिर पर हमले के बाद, रविदासिया समुदाय ने स्वयं को एक स्वतंत्र धर्म के रूप में घोषित किया।

उन्होंने एक नया पवित्र ग्रंथ “अमृतबानी गुरु रविदास जी” तैयार किया, जिसमें उनके 240 भजन शामिल हैं।

धार्मिक केंद्र

सबसे प्रमुख तीर्थ स्थल है—

  • श्री गुरु रविदास जन्म स्थान मंदिर (सीर गोवर्धनपुर, वाराणसी)

यह उनके अनुयायियों का मुख्य आध्यात्मिक केंद्र है, जहाँ हर वर्ष रविदास जयंती पर लाखों भक्त एकत्र होते हैं।

वैश्विक विस्तार

भारत के अलावा—

  • यूनाइटेड किंगडम
  • अमेरिका
  • कनाडा
  • ऑस्ट्रेलिया
  • यूरोप

जैसे देशों में भी रविदास के मंदिर स्थापित हैं।

ये मंदिर केवल पूजा स्थल ही नहीं, बल्कि—
👉 सांस्कृतिक और सामाजिक केंद्र भी हैं

Reference Wikipedia