निम्बार्काचार्य (निंबार्क, निम्बादित्य या नियमानंद) एक प्रसिद्ध हिंदू दार्शनिक और वेदांताचार्य थे, जिन्होंने द्वैताद्वैत वेदांत (द्वैत और अद्वैत का समन्वय) का प्रतिपादन किया। उन्होंने राधा-कृष्ण भक्ति पर विशेष बल दिया और निम्बार्क संप्रदाय की स्थापना की।
“निम्बार्क” शब्द दो संस्कृत शब्दों से बना है:
लोककथा के अनुसार, उन्होंने नीम के पत्तों में सूर्य की किरणों को रोक दिया था, जिसके कारण उन्हें “निम्बार्क” नाम प्राप्त हुआ।
निम्बार्काचार्य के जीवनकाल को लेकर विद्वानों में मतभेद है:
अधिकांश आधुनिक विद्वान उन्हें 7वीं शताब्दी ईस्वी के आसपास मानते हैं।
निम्बार्काचार्य का जन्म एक तेलुगु ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय मथुरा और वृंदावन क्षेत्र में बिताया।
उनके अनुयायी उन्हें भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का अवतार मानते हैं।
उनके जीवन के बारे में ऐतिहासिक विवरण बहुत सीमित हैं, लेकिन उनकी शिक्षाएँ और दर्शन अत्यंत प्रभावशाली रहे हैं।
यह ब्रह्मसूत्र पर लिखा गया एक संक्षिप्त भाष्य है, जिसमें द्वैताद्वैत वेदांत का प्रतिपादन किया गया है।
यह दस श्लोकों का सरल ग्रंथ है, जो साधकों को जटिल तर्कों के बिना सत्य का सार समझाता है।
यह 18 श्लोकों का ग्रंथ है, जिसमें गोपाल मंत्र का विस्तार से वर्णन किया गया है।
इस ग्रंथ में शरणागति (समर्पण) के सिद्धांत को समझाया गया है।
निम्बार्काचार्य का दर्शन द्वैत और अद्वैत का समन्वय है, जिसमें आत्मा और परमात्मा दोनों एक भी हैं और अलग भी हैं।
निम्बार्क के अनुसार:
निम्बार्काचार्य के अनुसार:
निम्बार्काचार्य का दर्शन अन्य वेदांताचार्यों से भिन्न है:
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