स्वामी प्रकाशानंद सरस्वती एक हिंदू सन्यासी और गुरु थे, जिन्होंने “इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ डिवाइन लव” की स्थापना की तथा अमेरिका में “राधा माधव धाम” मंदिर की स्थापना की। वे अपने धार्मिक कार्यों और लेखन के लिए जाने जाते थे, हालांकि बाद में वे गंभीर आपराधिक आरोपों और विवादों के कारण चर्चा में रहे।
स्वामी प्रकाशानंद सरस्वती का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनमें धार्मिक प्रवृत्ति थी और युवावस्था में वे ईश्वर की खोज में एकांत साधना करने लगे। 21 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने गुरु कृपालु महाराज से सन्यास की दीक्षा ली।
उन्होंने लगभग 20 वर्षों तक हिमालय और मध्य भारत के वनों में एक साधु के रूप में जीवन व्यतीत किया। वे जोशीमठ, बद्रीनाथ, ऋषिकेश, हरिद्वार, अमरकंटक, इलाहाबाद और काशी जैसे स्थानों पर रहे और अंततः वृंदावन तथा बरसाना में दीर्घकाल तक साधना की। वर्ष 1975 में उन्होंने अपने एकांत जीवन से बाहर आकर भक्ति मार्ग का प्रचार प्रारंभ किया।
स्वामी प्रकाशानंद सरस्वती ने 1975 में “इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ डिवाइन लव” की स्थापना की, जो बाद में कई देशों—जैसे भारत, इंग्लैंड, आयरलैंड, सिंगापुर, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया—में विस्तारित हुई। उन्होंने अमेरिका में भी अपने अनुयायियों के लिए आश्रम स्थापित किया।
उनका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर भक्ति और आध्यात्मिकता का प्रचार करना था और वे एक प्रतिष्ठित संत के रूप में जाने जाने लगे।
स्वामी प्रकाशानंद सरस्वती ने हिंदू धर्म, नैतिकता और आध्यात्मिकता से संबंधित कई पुस्तकें लिखीं। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “The True History and the Religion of India” भारतीय सभ्यता और धर्म का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करती है।
इस पुस्तक को 1999 में विश्व धर्म संसद में सम्मानित किया गया और बाद में इसे विभिन्न प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित किया गया। उन्होंने “Amazing Facts about Hinduism” नामक एक संक्षिप्त संस्करण भी लिखा।
उन्हें “धर्म चक्रवर्ती” की उपाधि भी प्रदान की गई और उनके कार्यों की प्रशंसा कई वैज्ञानिकों, सामाजिक एवं धार्मिक नेताओं द्वारा की गई।
1970 के दशक में उनके ध्यान और “डिवाइन लव मेडिटेशन” के प्रभावों पर वैज्ञानिक मैक्सवेल केड द्वारा अध्ययन किया गया। इस अध्ययन में उनके मस्तिष्क की तरंगों (EEG patterns) का परीक्षण किया गया, जिसमें असाधारण चेतना स्तर के संकेत पाए गए।
यह शोध “The Awakened Mind” जैसी प्रसिद्ध पुस्तक में प्रकाशित हुआ और ध्यान की वैज्ञानिक समझ में योगदान माना गया।
स्वामी प्रकाशानंद सरस्वती के जीवन का एक विवादास्पद पक्ष भी रहा। वर्ष 2007 में उनके खिलाफ बाल शोषण के आरोप लगाए गए। 2011 में एक अदालत ने उन्हें 20 मामलों में दोषी ठहराया और 18 वर्ष की सजा तथा 2 लाख डॉलर के जुर्माने का आदेश दिया।
सजा सुनाए जाने से पहले ही वे न्यायालय में उपस्थित नहीं हुए और फरार हो गए। इसके बाद उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया और इंटरपोल द्वारा भी उनके विरुद्ध नोटिस जारी किया गया।
उनके आश्रम “बरसाना धाम” ने भी बाद में उनसे दूरी बना ली और संगठन का नाम बदल दिया गया।
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