जगन्नाथ दास (1728–1809) कर्नाटक के एक महान संत-कवि और दार्शनिक थे, जो द्वैत वेदांत परंपरा के प्रमुख हरिदास संतों में गिने जाते हैं। वे कर्नाटक के रायचूर जिले के मणवी नगर के निवासी थे और मध्वाचार्य की गुरु परंपरा से जुड़े थे।
वे विशेष रूप से भगवान विष्णु की भक्ति और द्वैत दर्शन के प्रचार के लिए प्रसिद्ध हैं। वे राघवेंद्र मठ (मंत्रालयम) के संत वरदेंद्र तीर्थ के शिष्य थे।
विजयदास के समय से पहले, लगभग एक शताब्दी तक हरिदास भक्ति आंदोलन कमजोर पड़ गया था। लेकिन 18वीं शताब्दी में विजय दास के नेतृत्व में यह आंदोलन पुनः जीवित हुआ। इस बार इसका केंद्र मंत्रालयम (आंध्र प्रदेश) और रायचूर क्षेत्र बन गया।
जगन्नाथ दास और अन्य संत-कवियों की रचनाएँ 15वीं और 16वीं शताब्दी के हरिदास संतों की शैली का अनुसरण करती थीं। कन्नड़ साहित्य में हरिदास संतों का योगदान वैसा ही महत्वपूर्ण माना जाता है जैसा तमिलनाडु के आलवार और नयनार संतों तथा महाराष्ट्र और गुजरात के भक्त कवियों का योगदान है।
जगन्नाथ दास का जन्म एक माध्व ब्राह्मण परिवार में हुआ था और उनका प्रारंभिक नाम श्रीनिवासाचार्य था। वे संस्कृत भाषा के विद्वान थे और उन्होंने चारों शास्त्रों का अध्ययन किया था।
एक बार उन्हें विजय दास द्वारा मणवी में एक धार्मिक समारोह में आमंत्रित किया गया, जिसमें भक्तों के साथ भोजन भी शामिल था। लेकिन श्रीनिवासाचार्य को अपनी विद्वता पर घमंड था और वे कन्नड़ भाषा को साधारण लोगों की भाषा मानते थे। इसलिए उन्होंने इस निमंत्रण को ठुकरा दिया और कहा कि यदि वे भक्तों के साथ भोजन करेंगे तो उन्हें पेट दर्द हो जाएगा।
यह बात गोपाल दास को ज्ञात हुई, जिन्होंने इस व्यवहार से आहत होकर श्रीनिवासाचार्य को श्राप दे दिया। परिणामस्वरूप वे गंभीर पेट दर्द से पीड़ित हो गए। जब उन्हें कोई राहत नहीं मिली, तो वे विजय दास के पास गए, जिन्होंने उन्हें गोपाल दास से मिलने की सलाह दी।
गोपाल दास से मिलने पर वे ठीक हो गए और अपने अहंकार के लिए पश्चाताप किया। इसके बाद उन्होंने गोपाल दास को अपना गुरु मान लिया और हरिदास परंपरा को अपनाया। इसके पश्चात उन्होंने “जगन्नाथ विठ्ठल” नाम से अपनी रचनाएँ लिखनी प्रारंभ कीं।
जगन्नाथ दास ने कई महत्वपूर्ण कन्नड़ भक्ति ग्रंथों की रचना की, जिनमें प्रमुख हैं:
हरिकथामृतसार
यह उनका सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ (महाकाव्य) है, जिसमें मध्वाचार्य के द्वैत दर्शन का विस्तृत वर्णन है।
तत्त्व सुवाली
जगन्नाथ दास ने कन्नड़ भाषा में सरल और प्रभावशाली भक्ति साहित्य लिखकर द्वैत दर्शन को जन-जन तक पहुँचाया।
उन्होंने यह सिद्ध किया कि भक्ति केवल विद्वानों तक सीमित नहीं है, बल्कि आम जनता भी इसे सरल भाषा में समझ सकती है।
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