गुरुमयी चिद्विलासनंदा (जन्म 24 जून 1955), जिनका जन्म नाम मालती शेट्टी है, सिद्ध योग मार्ग की आध्यात्मिक गुरु और प्रमुख हैं। वे स्वामी चिद्विलासनंदा के नाम से भी जानी जाती हैं और उनके आश्रम भारत (गणेशपुरी) तथा पश्चिमी देशों जैसे न्यूयॉर्क (फॉल्सबर्ग) में स्थित हैं। उनके शिक्षण और संगठन का वैश्विक प्रतिनिधित्व SYDA फाउंडेशन द्वारा किया जाता है।
गुरुमयी चिद्विलासनंदा का जन्म एक आध्यात्मिक परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता स्वामी मुक्तानंद के भक्त थे और वे बचपन से ही गणेशपुरी स्थित गुरुदेव सिद्ध पीठ आश्रम जाया करती थीं। बचपन में ही उनका झुकाव योग और आध्यात्मिक साधना की ओर हो गया था। 14 वर्ष की आयु में उन्होंने स्वामी मुक्तानंद से शक्तिपात दीक्षा प्राप्त की और आश्रम में रहकर योग और साधना का अध्ययन प्रारंभ किया।
3 मई 1982 को गुरुमयी को सरस्वती संप्रदाय में संन्यास दीक्षा दी गई, जिसमें उन्होंने गरीबी, ब्रह्मचर्य और आज्ञाकारिता के व्रत ग्रहण किए। उन्हें स्वामी चिद्विलासनंदा नाम दिया गया, जिसका अर्थ है चेतना के आनंद में लीन होना। उसी समय स्वामी मुक्तानंद ने उन्हें और उनके भाई स्वामी नित्यानंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। स्वामी मुक्तानंद के निधन के बाद दोनों ने संयुक्त रूप से सिद्ध योग का नेतृत्व संभाला, लेकिन 1985 में उनके भाई ने यह मार्ग छोड़ दिया, जिसके बाद गुरुमयी एकमात्र आध्यात्मिक प्रमुख बन गईं।
1980 और 1990 के दशक में गुरुमयी ने भारत, अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अन्य देशों में प्रवचन दिए। उन्होंने सिद्ध योग शक्तिपात कार्यक्रमों का आयोजन किया, जिनके माध्यम से साधकों को कुंडलिनी जागरण और ध्यान साधना का अनुभव कराया जाता है। 1989 से 2019 तक SYDA फाउंडेशन ने इन कार्यक्रमों को वैश्विक स्तर पर आयोजित किया।
गुरुमयी ने 1992 में PRASAD प्रोजेक्ट की स्थापना की, जो स्वास्थ्य, शिक्षा और सामुदायिक विकास के क्षेत्रों में कार्य करता है। यह संगठन भारत में सामुदायिक विकास, अमेरिका में दंत चिकित्सा और मैक्सिको में नेत्र चिकित्सा सेवाएँ प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त, 1997 में उन्होंने मुक्तबोध इंडोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की, जिसका उद्देश्य प्राचीन भारतीय धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों को संरक्षित करना और उन्हें वैश्विक स्तर पर अध्ययन के लिए उपलब्ध कराना है।
गुरुमयी चिद्विलासनंदा ने कई आध्यात्मिक पुस्तकों की रचना की है, जिनमें 1989 में प्रकाशित “Kindle My Heart” प्रमुख है। इसके अतिरिक्त उन्होंने भक्ति, ध्यान और आध्यात्मिक जीवन पर आधारित कई पुस्तकें और काव्य रचनाएँ लिखी हैं।
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