गगनगिरी महाराज एक प्रसिद्ध भारतीय हिन्दू संत थे, जो नाथ संप्रदाय से संबंधित थे। वे कठोर तपस्या, ध्यान और योग साधना के लिए प्रसिद्ध थे। उनके कई अनुयायी उन्हें भगवान दत्तात्रेय का अवतार मानते हैं।
गगनगिरी महाराज का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के मंडुरे गाँव में हुआ। वे एक प्रतिष्ठित पाटणकर परिवार से थे, जो चालुक्य वंश के वंशज माने जाते हैं।
सिर्फ 7 वर्ष की आयु में उन्होंने घर छोड़ दिया और नाथ संप्रदाय के मठ में चले गए। बहुत कम उम्र में ही उन्होंने संन्यास धारण कर लिया।
उन्होंने नाथ संप्रदाय के संतों के साथ भारत के अनेक स्थानों की यात्रा की और कम उम्र में ही शास्त्र, योग और तंत्र विद्या में निपुण हो गए।
गगनगिरी महाराज ने अनेक पवित्र स्थानों की यात्राएँ कीं:
उन्होंने विभिन्न स्थानों पर कठोर तपस्या की और कई वर्षों तक साधना में लीन रहे।
उन्होंने जल में तप (जल तपस्या) और कायाकल्प साधना जैसी कठिन साधनाएँ कीं।
एक बार गुफा में विश्राम करते समय एक संत ने उन्हें जल छिड़ककर और विशेष जड़ी-बूटी देकर उनकी साधना को और उन्नत किया।
उन्होंने तांत्रिक साधनाओं में कई नए सिद्धांत विकसित किए और उन्हें सिद्ध भी किया।
उनकी साधना और ध्यान से लोगों को लाभ मिलने लगा, जिससे उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई।
उनके भक्तों में कई प्रसिद्ध व्यक्ति शामिल थे:
उन्होंने पूरे भारत में पैदल यात्रा की।
मुंबई में उन्होंने कई वर्षों तक निवास किया और गुरु पूर्णिमा का आयोजन बड़े स्तर पर किया जाता था।
उन्होंने 60 वर्षों से अधिक समय तक निरंतर तपस्या की।
गगनगिरी महाराज एक पर्यावरण प्रेमी संत भी थे।
उनके मुख्य उपदेश:
उनके प्रमुख आश्रम:
मलाड आश्रम में कोजागिरी पूर्णिमा के अवसर पर विशेष पूजा होती है।
उनके भक्त महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, गोवा, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में बड़ी संख्या में हैं।
उनके प्रसिद्ध भक्तों में शामिल हैं:
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