संत ज्ञानेश्वर

संत ज्ञानेश्वर

'सिद्धेश्वर मंदिर परिसर' , आलंदी ,पुणे
आपेगांव, यादव वंश (वर्तमान पैठण तालुका, छत्रपति संभाजीनगर, महाराष्ट्र)

Divine Journey & Teachings

संत ज्ञानेश्वर 

परिचय

संत ज्ञानेश्वर 13वीं शताब्दी के महान भारतीय संत, कवि, दार्शनिक और योगी थे। उन्हें ज्ञानदेव, ज्ञानेश्वर, माऊली आदि नामों से भी जाना जाता है। उन्होंने मराठी भाषा में अमर ग्रंथ ‘ज्ञानेश्वरी’ (भगवद्गीता पर टीका) और ‘अमृतानुभव’ की रचना की, जो मराठी साहित्य के सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण ग्रंथों में गिने जाते हैं।

व्यक्तिगत जीवन

  • जन्म: 1275 ईस्वी
  • जन्म स्थान: आपेगांव, यादव वंश (वर्तमान पैठण तालुका, छत्रपति संभाजीनगर, महाराष्ट्र)
  • मृत्यु: 1296 ईस्वी (लगभग 20–21 वर्ष की आयु में)
  • समाधि स्थल: आलंदी, पुणे जिला, महाराष्ट्र
  • पिता: विठ्ठल पंत
  • माता: रुक्मिणी बाई
  • सम्मान: संत, देव, माऊली

धार्मिक जीवन

  • धर्म: हिन्दू धर्म
  • दर्शन: अद्वैत वेदांत, वारकरी परंपरा

धार्मिक गुरु एवं परंपरा

  • गुरु: निवृत्तिनाथ (बड़े भाई)
  • संत ज्ञानेश्वर नाथ संप्रदाय और वारकरी भक्ति परंपरा के प्रमुख संत थे।

जीवन और साधना

संत ज्ञानेश्वर का जन्म गोदावरी नदी के तट पर स्थित आपेगांव गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता विठ्ठल पंत एक कुलकर्णी (लेखाकार) थे।

उनके पिता ने एक समय संन्यास ले लिया था, लेकिन बाद में गुरु के आदेश से वे पुनः गृहस्थ जीवन में लौट आए। इस कारण समाज के रूढ़िवादी ब्राह्मणों ने उनके परिवार का बहिष्कार कर दिया। परिणामस्वरूप ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहनों को सामाजिक और धार्मिक अधिकारों से वंचित किया गया।

उनके परिवार को अत्यधिक कष्ट सहने पड़े, यहाँ तक कि उनके माता-पिता ने प्रायश्चित स्वरूप इंद्रायणी नदी में जल समाधि ले ली। इसके बाद ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहन नाथ परंपरा में दीक्षित हुए और आगे चलकर महान संत बने।

आध्यात्मिक कार्य और रचनाएँ

संत ज्ञानेश्वर ने बहुत कम आयु में ही महान आध्यात्मिक उपलब्धियाँ प्राप्त कीं।

  • ज्ञानेश्वरी (1290 ई.) – भगवद्गीता का सरल मराठी भाष्य
  • अमृतानुभव – अद्वैत दर्शन और आत्मज्ञान पर आधारित ग्रंथ

उनकी शिक्षाएँ अद्वैत वेदांत, योग और भगवान विठोबा (विष्णु का रूप) के प्रति भक्ति पर आधारित थीं।

चमत्कार एवं कथाएँ

संत ज्ञानेश्वर के जीवन में कई चमत्कारी घटनाओं का उल्लेख मिलता है, जैसे:

  • भैंस से वेदों का पाठ करवाना
  • चलती हुई दीवार पर बैठकर साधक चांगदेव को विनम्र करना

ये कथाएँ उनकी योग शक्ति और आध्यात्मिक सिद्धि को दर्शाती हैं।

यात्राएँ और भक्ति आंदोलन

ज्ञानेश्वर ने अपने मित्र संत नामदेव के साथ भारत के अनेक तीर्थों की यात्रा की। उन्होंने वारकरी भक्ति आंदोलन को आगे बढ़ाया और अनेक लोगों को भक्ति मार्ग की ओर प्रेरित किया।

उनकी रचनाएँ (अभंग) आज भी महाराष्ट्र में अत्यंत श्रद्धा के साथ गाई जाती हैं।

संजీవन समाधि

संत ज्ञानेश्वर ने मात्र 21 वर्ष की आयु में संजీవन समाधि लेने का निर्णय लिया।

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को, आलंदी में उन्होंने गहन ध्यान में प्रवेश कर स्वयं को समाधि में स्थापित कर लिया। यह स्थान आज भी श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र है।

प्रभाव और विरासत

संत ज्ञानेश्वर का प्रभाव अत्यंत व्यापक रहा।

  • उन्होंने मराठी साहित्य को नई दिशा दी
  • वारकरी भक्ति आंदोलन के प्रमुख संस्थापकों में से एक बने
  • संत एकनाथ और संत तुकाराम जैसे महान संतों को प्रेरणा दी

आज भी लाखों श्रद्धालु उन्हें जीवित संत के रूप में मानते हैं और उनकी शिक्षाओं का पालन करते हैं।

चमत्कार 

संत ज्ञानेश्वर के जीवन से कई चमत्कारी कथाएँ जुड़ी हुई हैं। उनमें से एक कथा उनके शिष्य सच्चिदानंद के मृत शरीर को पुनर्जीवित करने की भी बताई जाती है।

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब ज्ञानेश्वर लगभग 12 वर्ष के थे, तब वे अपने भाई-बहनों के साथ पैठण गए। वहाँ के पंडितों ने उनका अपमान किया। उसी समय एक व्यक्ति एक बूढ़ी भैंस को मार रहा था, जिससे वह घायल होकर गिर गई।

ज्ञानेश्वर ने उस व्यक्ति को रोकने को कहा। पंडितों ने उनका मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि वेदों की शिक्षा की बजाय वे एक पशु की चिंता कर रहे हैं। इस पर ज्ञानेश्वर ने कहा कि वेदों के अनुसार हर जीव ब्रह्म का ही रूप है।

पंडितों ने चुनौती दी कि यदि ऐसा है तो यह भैंस भी वेद पढ़ सकती है। तब ज्ञानेश्वर ने भैंस के सिर पर हाथ रखा और वह भैंस वेदों का पाठ करने लगी।

एक अन्य चमत्कार में, महान योगी चांगदेव, जो अपनी सिद्धियों के कारण बाघ पर सवारी करते थे, उन्होंने ज्ञानेश्वर को चुनौती दी। तब ज्ञानेश्वर ने चलती हुई दीवार पर बैठकर उनकी चुनौती को स्वीकार किया और उन्हें विनम्र बना दिया।

ज्ञानेश्वर ने चांगदेव को 65 श्लोकों में उपदेश दिया, जिसे “चांगदेव पासष्ठी” कहा जाता है। बाद में चांगदेव उनकी बहन मुक्ताबाई के शिष्य बन गए।

रचनाएँ 

संत ज्ञानेश्वर मराठी भाषा में लिखने वाले पहले महान दार्शनिकों में से एक थे।

  • ज्ञानेश्वरी (1290 ई.) – भगवद्गीता पर मराठी भाष्य
  • अमृतानुभव – गहन दार्शनिक ग्रंथ

उन्होंने ज्ञानेश्वरी को मराठी भाषा में लिखा ताकि आम लोग भी जीवन के दार्शनिक सिद्धांतों को समझ सकें। उस समय यह ज्ञान केवल संस्कृत जानने वाले लोगों तक सीमित था।

ज्ञानेश्वरी में उन्होंने अंत में “पासायदान” लिखा, जिसमें उन्होंने पूरी मानवता के कल्याण की प्रार्थना की, न कि अपने लिए कुछ माँगा।

उनका प्रसिद्ध विचार था:
👉 “यह सम्पूर्ण विश्व एक ही आत्मा है।”

भाषा और शैली

ज्ञानेश्वर ने अपनी रचनाएँ ओवी छंद में लिखीं, जो महाराष्ट्र में लोकगीतों की शैली थी।

उनकी लेखन शैली सरल, प्रवाहमयी और गहन दर्शन से परिपूर्ण थी, जिससे सामान्य व्यक्ति भी गूढ़ ज्ञान को समझ सके।

प्रभाव और महत्व

ज्ञानेश्वर का मराठी भाषा में लिखना भारतीय इतिहास में एक बड़ा परिवर्तन था।

  • उन्होंने दर्शन को आम जनता तक पहुँचाया
  • संस्कृत के प्रभुत्व को चुनौती दी
  • भक्ति आंदोलन को नई दिशा दी

मराठी साहित्य में उनका स्थान वैसा ही माना जाता है जैसा इटली में दांते का है।

अन्य रचनाएँ और परंपरा

ज्ञानेश्वर के अभंग (भक्ति गीत) उनकी तीर्थ यात्राओं के दौरान रचे गए, विशेषकर पंढरपुर यात्रा के समय।

प्रभाव

उनके जीवन और विचारों पर कई परंपराओं का प्रभाव पड़ा:

  • नाथ योगी परंपरा – योग, हठयोग और अद्वैत विचार
  • महानुभाव संप्रदाय – भक्ति और समानता का सिद्धांत
  • भागवत पुराण और उपनिषद – आध्यात्मिक आधार

उनके गुरु निवृत्तिनाथ थे, जिन्होंने उन्हें नाथ परंपरा में दीक्षित किया।

दर्शन

संत ज्ञानेश्वर का दर्शन अद्वैत (Non-dualism) पर आधारित था।

उन्होंने कहा कि:

  • परम सत्य (ब्रह्म) स्वयं सिद्ध है
  • ज्ञान और अज्ञान के पार एक शुद्ध चेतना है
  • वास्तविकता को अनुभव से समझा जा सकता है

उनके अनुसार, सत्य को केवल तर्क या शास्त्रों से नहीं, बल्कि आत्मानुभूति से जाना जा सकता है।

नीति (Ethics / नैतिक दर्शन)

संत ज्ञानेश्वर का नैतिक दर्शन मुख्यतः भगवद्गीता के 13वें अध्याय की उनकी व्याख्या (ज्ञानेश्वरी) में प्रकट होता है।

वे निम्न गुणों को सद्गुण (Virtues) मानते हैं:

  • विनम्रता
  • अहिंसा (विचार, वचन और कर्म से)
  • विपरीत परिस्थितियों में धैर्य
  • इन्द्रिय सुखों से विरक्ति
  • मन और हृदय की पवित्रता
  • एकांत का प्रेम
  • गुरु और भगवान के प्रति भक्ति

इसके विपरीत गुणों को वे दोष (Vices) मानते हैं।

ज्ञानेश्वर के अनुसार, अपने जीवन के प्रति एक प्रकार का वैराग्यपूर्ण दृष्टिकोण (अहंकार से मुक्त दृष्टि) आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक है। वे कहते हैं कि संत किसी भी वस्तु—चाहे वह सजीव हो या निर्जीव—में भेद नहीं देखते, क्योंकि वे सबको अपने ही आत्मस्वरूप के रूप में अनुभव करते हैं।

गुरु भक्ति और जीवन दृष्टि

ज्ञानेश्वरी के अनेक अध्याय उनके गुरु निवृत्तिनाथ की वंदना से आरंभ होते हैं। वे अपने गुरु के मार्गदर्शन को “संसार रूपी सागर को पार करने का साधन” मानते हैं।

दैवी और आसुरी गुण 

भगवद्गीता के 16वें अध्याय की व्याख्या में ज्ञानेश्वर ने गुणों को दो भागों में बाँटा:

दैवी गुण 

  • निर्भयता (सभी में एकता की भावना से उत्पन्न)
  • दान
  • यज्ञ (कर्तव्य पालन)
  • करुणा
  • अन्य सद्गुण

आसुरी गुण 

  • अज्ञान
  • क्रोध
  • अहंकार
  • कपट
  • कठोरता
  • घमंड

कर्मयोग 

ज्ञानेश्वर ने भगवद्गीता के कर्मयोग सिद्धांत को पुनः स्पष्ट किया।

वे बताते हैं कि:

  • कर्म करते हुए भी निष्क्रियता (Actionlessness) प्राप्त की जा सकती है
  • जैसे सूर्य दिखाई देता है कि वह चलता है, पर वास्तव में स्थिर रहता है
  • वैसे ही कर्मयोगी कर्म करते हुए भी वास्तव में कर्म से परे होता है

उनके अनुसार, निम्न चार उपाय आत्मज्ञान की ओर ले जाते हैं:

  1. अपने कर्तव्यों का पालन
  2. अहंकार रहित कर्म
  3. कर्म के फल का त्याग
  4. अपने कर्म भगवान को समर्पित करना

नैतिक निष्कर्ष

ज्ञानेश्वर के अनुसार:

  • यह संसार ईश्वर की अभिव्यक्ति है, माया (भ्रम) मात्र नहीं
  • इसलिए संसार का त्याग नहीं, बल्कि कर्तव्य पालन ही श्रेष्ठ है
  • हर कार्य को पूजा भाव से करना चाहिए

धर्म और सामाजिक व्यवस्था

भारतीय परंपरा में “ऋत” (Rta) को एक प्राकृतिक नियम माना गया है, जो ब्रह्मांड और समाज दोनों को संचालित करता है।

ज्ञानेश्वर के अनुसार:

  • धर्म और दैवी व्यवस्था एक ही हैं
  • समाज की संस्थाएँ (जैसे परिवार, विवाह) बनाए रखना आवश्यक है
  • कर्तव्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ऊपर है

हालाँकि, जाति व्यवस्था के संदर्भ में उनका दृष्टिकोण अधिक मानवीय था। वे आध्यात्मिक समानता (Spiritual Equality) का समर्थन करते थे।

स्वीकृति और विरासत 

संत ज्ञानेश्वर के जीवन और शिक्षाओं ने वारकरी भक्ति आंदोलन को गहराई से प्रभावित किया।

  • उन्होंने सामाजिक संकीर्णता का विरोध किया
  • परिवार और भक्ति दोनों को महत्व दिया
  • सभी के लिए समान आध्यात्मिक मार्ग प्रस्तुत किया

वारी 

वारकरी संप्रदाय के भक्त हर वर्ष आषाढ़ मास में एक विशेष यात्रा (वारी) करते हैं:

  • यह यात्रा आलंदी से पंढरपुर तक होती है
  • इसमें संत ज्ञानेश्वर की पादुकाएँ (चप्पल) पालकी में ले जाई जाती हैं
  • हजारों भक्त इस यात्रा में भाग लेते हैं

प्रभाव 

ज्ञानेश्वर के दर्शन का प्रभाव कई संतों पर पड़ा:

  • संत नामदेव
  • संत एकनाथ
  • संत तुकाराम

उनकी रचनाओं में ज्ञानेश्वर के अद्वैत और भक्ति के विचार स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

Reference Wikipedia