भास्करराय
भास्करराय ललिता देवी के भक्त थे।
भास्करराय माखिन (1690–1785) हिंदू धर्म की शाक्त परंपरा के एक प्रमुख व्याख्याकार और लेखक थे।
उनका जन्म हैदराबाद, तेलंगाना में एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
भास्करराय का दक्षिण भारत में भोंसले वंश के राजा सरफोजी द्वितीय ने स्वागत किया, जिसके बाद वे तमिलनाडु में बस गए।
धर्मशास्त्र के विद्वान डगलस रेनफ्रू ब्रूक्स के अनुसार, भास्करराय न केवल श्रीविद्या के उत्कृष्ट व्याख्याकार थे, बल्कि एक व्यापक ज्ञान वाले लेखक भी थे।
वे ऐसे विचारक थे जिनके पास तांत्रिक और वैदिक परंपराओं का गहरा ज्ञान था।
वे शाक्त तंत्र की श्रीविद्या परंपरा से संबंधित थे।
साहित्यिक योगदान (Literary contributions)
भास्करराय ने 40 से अधिक ग्रंथों की रचना की, जिनमें वेदांत से लेकर भक्ति काव्य, भारतीय तर्कशास्त्र, संस्कृत व्याकरण और तंत्रशास्त्र तक के विषय शामिल हैं।
उनकी कई रचनाएँ शाक्त परंपरा में विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, विशेषकर देवी माँ पर केंद्रित ग्रंथ।
उनकी प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं:
• त्रिपुरा उपनिषद और भावना उपनिषद पर टीका
• देवी महात्म्य पर “गुप्तवती” नामक टीका, जिसमें उन्होंने 579 श्लोकों में से 224 पर टिप्पणी की
• “वरिवस्य रहस्य” – श्रीविद्या मंत्र और उपासना पर आधारित टीका, जिसमें 167 श्लोक हैं
• “प्रकाश” – वरिवस्य रहस्य पर उनकी ही लिखी हुई व्याख्या
• “सेतुबंध” – तांत्रिक साधना पर एक महत्वपूर्ण ग्रंथ, जिसे उनकी प्रमुख कृति माना जाता है; यह वामकेश्वर तंत्र के एक भाग पर आधारित है और त्रिपुरा सुंदरी की बाह्य और आंतरिक पूजा का वर्णन करता है
• “सौभाग्यभास्कर” – ललिता सहस्रनाम पर लिखी गई टीका (1728 ई.)
• “खद्योत” – गणेश सहस्रनाम पर उनकी टीका, जिसे गणपत्यों द्वारा प्रामाणिक माना जाता है
भास्करराय ललिता देवी के भक्त थे।
भास्करराय माखिन (1690–1785) हिंदू धर्म की शाक्त परंपरा के एक प्रमुख व्याख्याकार और लेखक थे।
उनका जन्म हैदराबाद, तेलंगाना में एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
भास्करराय का दक्षिण भारत में भोंसले वंश के राजा सरफोजी द्वितीय ने स्वागत किया, जिसके बाद वे तमिलनाडु में बस गए।
धर्मशास्त्र के विद्वान डगलस रेनफ्रू ब्रूक्स के अनुसार, भास्करराय न केवल श्रीविद्या के उत्कृष्ट व्याख्याकार थे, बल्कि एक व्यापक ज्ञान वाले लेखक भी थे।
वे ऐसे विचारक थे जिनके पास तांत्रिक और वैदिक परंपराओं का गहरा ज्ञान था।
वे शाक्त तंत्र की श्रीविद्या परंपरा से संबंधित थे।
साहित्यिक योगदान (Literary contributions)
भास्करराय ने 40 से अधिक ग्रंथों की रचना की, जिनमें वेदांत से लेकर भक्ति काव्य, भारतीय तर्कशास्त्र, संस्कृत व्याकरण और तंत्रशास्त्र तक के विषय शामिल हैं।
उनकी कई रचनाएँ शाक्त परंपरा में विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, विशेषकर देवी माँ पर केंद्रित ग्रंथ।
उनकी प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं:
• त्रिपुरा उपनिषद और भावना उपनिषद पर टीका
• देवी महात्म्य पर “गुप्तवती” नामक टीका, जिसमें उन्होंने 579 श्लोकों में से 224 पर टिप्पणी की
• “वरिवस्य रहस्य” – श्रीविद्या मंत्र और उपासना पर आधारित टीका, जिसमें 167 श्लोक हैं
• “प्रकाश” – वरिवस्य रहस्य पर उनकी ही लिखी हुई व्याख्या
• “सेतुबंध” – तांत्रिक साधना पर एक महत्वपूर्ण ग्रंथ, जिसे उनकी प्रमुख कृति माना जाता है; यह वामकेश्वर तंत्र के एक भाग पर आधारित है और त्रिपुरा सुंदरी की बाह्य और आंतरिक पूजा का वर्णन करता है
• “सौभाग्यभास्कर” – ललिता सहस्रनाम पर लिखी गई टीका (1728 ई.)
• “खद्योत” – गणेश सहस्रनाम पर उनकी टीका, जिसे गणपत्यों द्वारा प्रामाणिक माना जाता है
Reference Wikipedia