यू. जी. कृष्णमूर्ति

यू. जी. कृष्णमूर्ति

यू.जी. कृष्णमूर्ति के प्रशंसक या प्रकाशन
मछलीपट्टनम, आंध्र प्रदेश, भारत

Divine Journey & Teachings

यू. जी. कृष्णमूर्ति 

परिचय

यू. जी. कृष्णमूर्ति (9 जुलाई 1918 – 22 मार्च 2007), जिनका पूरा नाम उप्पलुरी गोपाला कृष्णमूर्ति था, एक भारतीय विचारक और सार्वजनिक वक्ता थे, जिन्हें अक्सर “एंटी-गुरु” कहा जाता है। उन्होंने पारंपरिक आध्यात्मिकता और ज्ञान प्राप्ति (Enlightenment) की अवधारणा पर प्रश्न उठाए और इसे निरर्थक बताया।

उन्होंने अपने जीवन में एक गहन जैविक परिवर्तन का अनुभव किया, जिसे उन्होंने “द कैलेमिटी (The Calamity)” कहा। उनके अनुसार यह कोई आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक जैविक अवस्था है, जिसे किसी साधना या प्रयास से प्राप्त नहीं किया जा सकता।

व्यक्तिगत जीवन

  • पूरा नाम: उप्पलुरी गोपाला कृष्णमूर्ति
  • जन्म: 9 जुलाई 1918
  • जन्म स्थान: मछलीपट्टनम, आंध्र प्रदेश, भारत
  • मृत्यु: 22 मार्च 2007 (आयु 88 वर्ष)
  • मृत्यु स्थान: वल्लेक्रोसिया, इटली
  • पेशा: सार्वजनिक वक्ता
  • शिक्षा: मद्रास विश्वविद्यालय (बी.ए.)
  • संतान: 4

प्रारंभिक जीवन 

यू. जी. कृष्णमूर्ति का जन्म आंध्र प्रदेश के मछलीपट्टनम में हुआ और उनका पालन-पोषण गुडीवाड़ा में हुआ। जन्म के सात दिन बाद ही उनकी माता का निधन हो गया, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनके नाना ने किया, जो एक समृद्ध ब्राह्मण वकील और थियोसोफिकल सोसाइटी से जुड़े हुए थे।

युवावस्था में ही वे थियोसोफिकल सोसाइटी के सदस्य बन गए और उन्होंने विभिन्न आध्यात्मिक अभ्यासों के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने का प्रयास किया। 14 से 21 वर्ष की आयु के बीच उन्होंने कई साधनाएँ कीं और यह जानने का प्रयास किया कि क्या वास्तव में मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

उन्होंने हिमालय में स्वामी शिवानंद के साथ समय बिताया, जहाँ उन्होंने योग और ध्यान का अभ्यास किया। इसके साथ ही उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान, दर्शन, रहस्यवाद और विज्ञान का अध्ययन किया, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ दी, क्योंकि उन्हें लगा कि पूर्व और पश्चिम दोनों ही परंपराएँ उनके प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर नहीं दे पा रही हैं।

आध्यात्मिक खोज 

1939 में 21 वर्ष की आयु में उनकी मुलाकात प्रसिद्ध संत रामण महर्षि से हुई। उन्होंने उनसे पूछा कि क्या वे उन्हें मोक्ष दे सकते हैं। इस पर रामण महर्षि ने उत्तर दिया—“मैं दे सकता हूँ, लेकिन क्या तुम उसे ग्रहण कर सकते हो?”

इस उत्तर ने उनके आध्यात्मिक दृष्टिकोण को बदल दिया। बाद में उन्होंने इस उत्तर को अहंकारी माना, लेकिन यह उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

1941 में उन्होंने थियोसोफिकल सोसाइटी में कार्य करना शुरू किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्याख्यान देने लगे। उन्होंने यूरोप और अमेरिका के कई देशों की यात्रा की।

1943 में उन्होंने कुसुमा कुमारी नामक महिला से विवाह किया।

1947 से 1953 के बीच उन्होंने जिद्दू कृष्णमूर्ति के व्याख्यानों में भाग लिया और उनसे गहन संवाद किया। कुछ समय बाद उन्होंने उनके विचारों को भी अस्वीकार कर दिया और कहा कि किसी भी प्रकार की आध्यात्मिक शिक्षा संभव नहीं है।

उनका अंतिम संवाद यह कहते हुए समाप्त हुआ कि यदि किसी को सत्य का अनुभव स्वयं नहीं हो सकता, तो उसे दूसरों द्वारा सिखाया भी नहीं जा सकता।

विचार और दर्शन

यू. जी. कृष्णमूर्ति ने सभी प्रकार की आध्यात्मिक परंपराओं, गुरु-शिष्य संबंध और ज्ञान की खोज को अस्वीकार किया। उनका मानना था कि कोई भी व्यक्ति “ज्ञान” या “प्रबोधन” प्राप्त नहीं कर सकता।

उन्होंने कहा कि मानव मस्तिष्क द्वारा निर्मित सभी विचार और ज्ञान की प्रणालियाँ भ्रम हैं और वास्तविकता को समझने का कोई मार्ग नहीं है।

उनका प्रसिद्ध कथन था:
👉 “कुछ भी समझने जैसा नहीं है।”

उन्होंने अपने अनुभवों को सैद्धांतिक नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव (experiential) पर आधारित बताया।

लंदन काल 

यू. जी. कृष्णमूर्ति अपने परिवार से अलग होकर लंदन चले गए। एक दिन हाइड पार्क में बैठे हुए एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें वहाँ से जाने के लिए कहा और धमकी दी कि यदि वे नहीं गए तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। उस समय उनके पास केवल पाँच पेंस बचे थे। वे लंदन स्थित रामकृष्ण मिशन पहुँचे, जहाँ एक स्वामी ने उन्हें एक रात के लिए होटल में ठहरने हेतु धन दिया।

अगले दिन उन्होंने रामकृष्ण मिशन में कार्य करना शुरू किया, जहाँ वे लगभग तीन महीनों तक रहे। मिशन छोड़ते समय उन्होंने स्वामीजी के लिए एक पत्र छोड़ा, जिसमें लिखा था कि वे एक नए व्यक्ति बन चुके हैं।

इसी दौरान जिद्दू कृष्णमूर्ति भी लंदन में थे और दोनों के बीच पुनः मुलाकात हुई। जिद्दू ने उनके वैवाहिक जीवन से जुड़ी समस्याओं पर सलाह देने का प्रयास किया, लेकिन यू. जी. ने उसे अस्वीकार कर दिया। बाद में उन्होंने जिद्दू के कुछ व्याख्यान भी सुने, लेकिन उन्हें उनमें कोई रुचि नहीं लगी।

1961 में उन्होंने अपनी पत्नी से संबंध समाप्त कर लिया और लंदन छोड़ दिया। इसके बाद वे पेरिस गए, जहाँ उन्होंने कुछ समय बिताया। बाद में वे स्विट्जरलैंड जाने के लिए निकले, लेकिन गलती से जिनेवा पहुँच गए।

स्विट्जरलैंड का प्रारंभिक काल 

जिनेवा पहुँचने के बाद यू. जी. के पास होटल का बिल चुकाने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने भारतीय दूतावास में शरण ली। वे निराश और हताश महसूस कर रहे थे और स्वयं को “समाप्त” मानने लगे थे।

दूतावास की एक कर्मचारी, वेलेंटाइन डी केर्वेन, ने उन्हें अपने घर में रहने का स्थान दिया। दोनों के बीच गहरी मित्रता हो गई और उन्होंने स्विट्जरलैंड में यू. जी. की सहायता की।

कुछ वर्षों तक यू. जी. ने ज्ञान या आध्यात्मिकता से जुड़े प्रश्नों में कोई रुचि नहीं दिखाई, लेकिन 1967 में वे पुनः “ज्ञान” की अवधारणा को समझने के प्रति उत्सुक हुए।

ज्ञान की खोज और अनुभव 

1967 में उन्होंने जिद्दू कृष्णमूर्ति का एक व्याख्यान सुना, जिसमें वे “ज्ञान की अवस्था” का वर्णन कर रहे थे। यू. जी. को लगा कि जिद्दू जिस अवस्था का वर्णन कर रहे हैं, वह वही अवस्था है जिसमें वे स्वयं पहले से हैं।

इस अनुभव ने उनके भीतर एक गहरा परिवर्तन उत्पन्न किया और उन्होंने महसूस किया कि वे जिस सत्य की खोज कर रहे थे, वह पहले से ही उनके भीतर मौजूद है।

“कैलेमिटी” का अनुभव 

इसके बाद यू. जी. ने स्वयं से प्रश्न किया—“मुझे कैसे पता चले कि मैं उस अवस्था में हूँ?” इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिला, और अचानक उनके शरीर और मन में एक गहरा परिवर्तन हुआ।

उन्होंने इसे “कैलेमिटी” (Calamity) कहा, जिसमें उनके शरीर की प्रत्येक कोशिका, तंत्रिका और ग्रंथि पर प्रभाव पड़ा। यह अनुभव अत्यंत तीव्र और कष्टदायक था, जिसे उन्होंने एक प्रकार की “जैविक विस्फोट” के रूप में वर्णित किया।

उनके अनुसार यह कोई आनंदमय या आध्यात्मिक अनुभव नहीं था, बल्कि एक शारीरिक और मानसिक पीड़ा से भरा परिवर्तन था।

आठवें दिन उन्हें अत्यधिक ऊर्जा का अनुभव हुआ, जिसने उनके पूरे शरीर को हिला दिया। यह ऊर्जा इतनी प्रबल थी कि वे इसे नियंत्रित नहीं कर सके और यह कई दिनों तक जारी रही।

यू. जी. ने स्पष्ट किया कि यह अनुभव किसी साधना, ज्ञान या प्रयास का परिणाम नहीं था, बल्कि यह पूरी तरह आकस्मिक था। उन्होंने यह भी कहा कि इस अनुभव को किसी अन्य व्यक्ति को सिखाया या दिया नहीं जा सकता।

कैलेमिटी के बाद का जीवन 

यू. जी. कृष्णमूर्ति के अनुसार उनके जीवन को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है—कैलेमिटी से पहले और उसके बाद। कैलेमिटी के बाद उन्होंने स्वयं को एक ऐसी अवस्था में पाया जिसे उन्होंने “प्राकृतिक अवस्था (Natural State)” कहा। यह एक ऐसी स्थिति थी जिसमें जीवन केवल शारीरिक और इंद्रिय अनुभवों पर आधारित था, जहाँ विचारों की निरंतरता नहीं रहती थी।

उन्होंने यह भी कहा कि इस अवस्था में पहुँचने के बाद उनका संचित ज्ञान और स्मृतियाँ समाप्त हो गईं, मानो उनका मन पूरी तरह से खाली हो गया हो, और उन्हें सब कुछ दोबारा सीखना पड़ा।

कैलेमिटी के बाद वे दुनिया भर में यात्रा करते रहे, लेकिन उन्होंने औपचारिक व्याख्यान देना बंद कर दिया। वे केवल उन लोगों से अनौपचारिक रूप से बातचीत करते थे जो उनसे मिलने आते थे। उन्होंने 1972 में भारत में अपना अंतिम औपचारिक सार्वजनिक व्याख्यान दिया।

मृत्यु

यू. जी. कृष्णमूर्ति का निधन 22 मार्च 2007 को इटली के वल्लेक्रोसिया में हुआ। मृत्यु से पहले वे गिरने के कारण घायल हो गए थे और सात सप्ताह तक बिस्तर पर रहे।

उनके अंतिम समय में उनके कुछ निकट मित्र उनके साथ थे, जिनमें महेश भट्ट भी शामिल थे। उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा के अनुसार किसी भी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान या अंतिम संस्कार की व्यवस्था नहीं चाही थी।

उनका अंतिम भाषण “My Swan Song” फरवरी 2007 में रिकॉर्ड किया गया था। उनके निधन के बाद उनके शरीर का अंतिम संस्कार किया गया।

स्वास्थ्य और जीवनशैली

यू. जी. अपने अनोखे खान-पान और जीवनशैली के लिए जाने जाते थे। वे अपने साथ एक छोटा “पोर्टेबल किचन” रखते थे और बहुत अधिक नमक तथा क्रीम का सेवन करते थे।

वे मानते थे कि भोजन सरल और जल्दी तैयार होना चाहिए। 1949 के बाद उन्होंने कभी डॉक्टर से परामर्श नहीं लिया और न ही कोई दवा ली। उनका विश्वास था कि शरीर स्वयं अपनी देखभाल कर सकता है।

शिक्षा का निषेध 

यू. जी. कृष्णमूर्ति ने किसी भी प्रकार की “शिक्षा” या “उपदेश” की अवधारणा को अस्वीकार किया। उनका कहना था कि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे में परिवर्तन नहीं ला सकता, इसलिए किसी भी प्रकार की आध्यात्मिक शिक्षा का कोई अर्थ नहीं है।

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा:
👉 “मेरे पास कोई शिक्षा नहीं है। समझने के लिए कुछ भी नहीं है।”

उनके अनुसार, जो कुछ वे कहते थे, वह किसी सिद्धांत या प्रणाली पर आधारित नहीं था, बल्कि केवल व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन था।

दर्शन 

यू. जी. के अनुसार “स्व” (Self) एक भ्रम है, जो विचारों द्वारा निर्मित होता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य की चेतना निरंतर विचारों के माध्यम से स्वयं को बनाए रखने का प्रयास करती है, जिससे “मैं” की भावना उत्पन्न होती है।

उन्होंने यह भी कहा कि जब विचारों की यह निरंतरता टूट जाती है, तब शरीर अपनी प्राकृतिक अवस्था में लौट आता है और विचार अपनी सीमित भूमिका में रह जाते हैं।

उनका मानना था कि “आत्मज्ञान” का अर्थ यह समझना है कि वास्तव में कोई “स्व” अस्तित्व में नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि कोई “जानने वाला” (knower) नहीं होता, बल्कि केवल “विचार” ही होते हैं। उन्होंने प्रसिद्ध दार्शनिक डेसकार्ट के कथन “मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ” को अस्वीकार करते हुए कहा कि वास्तव में “सोचने वाला कोई नहीं है, केवल सोच ही है।”

उन्होंने “विश्व मन (World Mind)” की अवधारणा को स्वीकार किया, जिसमें मानवता के सभी अनुभव और ज्ञान संचित होते हैं। उनके अनुसार मानव मस्तिष्क एक एंटीना की तरह कार्य करता है, जो इस विचारों के क्षेत्र से आवश्यक विचारों को ग्रहण करता है।

Reference Wikipedia