रामानुज

रामानुज

श्रीपेरंबुदूर आश्रम (जन्मस्थान, तमिलनाडु)
श्रीपेरंबुदूर, चोल साम्राज्य (वर्तमान तमिलनाडु, भारत)

Divine Journey & Teachings

रामानुज

व्यक्तिगत जीवन

जन्म: इळैयाज़्वार हारितस (Iḷaiyāḻvār hārītasa)
1077 (परंपरागत तिथि: 1017)
श्रीपेरंबुदूर, चोल साम्राज्य
(वर्तमान तमिलनाडु, भारत)

मृत्यु: 1157 (आयु 79–80 वर्ष)
(परंपरागत तिथि: 1137)
श्रीरंगम, चोल साम्राज्य
(वर्तमान तमिलनाडु, भारत)

माता-पिता:
केशव सोमयाजी (पिता)
कांथिमथि देवी (माता)

सम्मान: एम्पेरुमानार, उदैयावर, यतिराज (संन्यासियों के राजा)

धार्मिक जीवन

धर्म: हिंदू धर्म
दर्शन: विशिष्टाद्वैत
संप्रदाय: श्रीवैष्णव
आंदोलन: भक्ति आंदोलन

धार्मिक करियर

गुरु: यादव प्रकाश

रामानुज (c. 1077 – 1157), जिन्हें रामानुजाचार्य के नाम से भी जाना जाता है, एक महान भारतीय हिंदू दार्शनिक, गुरु और समाज सुधारक थे।

वे हिंदू धर्म की श्रीवैष्णव परंपरा के सबसे महत्वपूर्ण आचार्यों में से एक थे।

उनकी भक्ति आधारित दर्शन प्रणाली ने भक्ति आंदोलन को गहराई से प्रभावित किया।

दर्शन और योगदान

रामानुज विशिष्टाद्वैत वेदांत (Qualified Non-dualism) के प्रमुख प्रवर्तक थे।

उनकी दर्शन प्रणाली—

  • आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत
  • मध्वाचार्य के द्वैत वेदांत

के साथ मिलकर मध्यकालीन भारत की तीन प्रमुख वेदांत परंपराओं में से एक मानी जाती है।

मुख्य सिद्धांत

रामानुज के अनुसार—

👉 आत्मा (आत्मन) और ब्रह्म (परम सत्य) अलग भी हैं और जुड़े भी हैं
👉 सभी आत्माएँ ब्रह्म का हिस्सा हैं
👉 ईश्वर (विशेष रूप से विष्णु) के प्रति भक्ति ही मुक्ति का मार्ग है

उन्होंने भक्ति को आध्यात्मिक मुक्ति का सबसे महत्वपूर्ण साधन बताया।

प्रमुख ग्रंथ

रामानुज ने कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे, जैसे—

  • ब्रह्मसूत्र भाष्य
  • भगवद्गीता भाष्य

उनके शिष्यों ने भी कई ग्रंथों की रचना की।

प्रारंभिक जीवन

रामानुज का जन्म तमिल ब्राह्मण परिवार में श्रीपेरंबुदूर गाँव में हुआ था।

उनका जीवनकाल परंपरागत रूप से 1017–1137 माना जाता है, लेकिन आधुनिक विद्वान 1077–1157 को अधिक उपयुक्त मानते हैं।

शिक्षा

उन्होंने कांचीपुरम में अपने गुरु यादव प्रकाश से वेद और उपनिषदों की शिक्षा प्राप्त की।

लेकिन वे अपने गुरु की अद्वैत व्याख्या से सहमत नहीं थे और उन्होंने अलग मार्ग अपनाया।

श्रीवैष्णव परंपरा

रामानुज ने—

  • तमिल आलवार संतों
  • और विद्वान नाथमुनि तथा यमुनाचार्य

की परंपरा को आगे बढ़ाया।

हालाँकि वे यमुनाचार्य से मिलने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन उनकी मृत्यु पहले ही हो चुकी थी।

संन्यास

रामानुज ने बाद में गृहस्थ जीवन त्यागकर संन्यास ग्रहण किया और श्रीवैष्णव परंपरा के प्रमुख आचार्य बने।

कार्य और शिक्षाएँ

रामानुज कांचीपुरम के वरदराज पेरुमाल मंदिर में पुजारी बने।

उन्होंने सिखाया कि—
👉 मोक्ष केवल निराकार ब्रह्म से नहीं
👉 बल्कि सगुण भगवान विष्णु की भक्ति से प्राप्त होता है

उन्होंने ईश्वर को व्यक्तिगत रूप में स्वीकार किया और भक्ति को सर्वोच्च साधन माना।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

रामानुज का जीवन चोल साम्राज्य के समय में बीता, जो धार्मिक विविधता का युग था।

इस समय—

  • वैष्णव
  • शैव
  • बौद्ध
  • जैन

सभी परंपराएँ साथ-साथ विकसित हो रही थीं।

प्रभाव

रामानुज पहले ऐसे दार्शनिकों में से थे जिन्होंने—
👉 शंकराचार्य के अद्वैत सिद्धांत को चुनौती दी
👉 और उपनिषदों की नई व्याख्या प्रस्तुत की

प्रारंभिक जीवन

जब रामानुज और उनके गुरु यादव प्रकाश के बीच वेदों की व्याख्या को लेकर मतभेद हुआ, तब वे अलग हो गए। इसके बाद रामानुज कांचीपुरम के वरदराज पेरुमाल मंदिर के भक्त बन गए।

इस समय उनके प्रवचन और प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैलने लगी।

यमुनाचार्य, जो श्रीरंगम के रंगनाथस्वामी मंदिर के प्रमुख आचार्य थे, रामानुज पर बचपन से ही ध्यान दे रहे थे। उन्होंने अपने शिष्य महापूर्ण को कांची भेजा ताकि रामानुज को श्रीरंगम बुलाया जा सके।

यमुनाचार्य से न मिल पाना

जब महापूर्ण रामानुज को लेकर श्रीरंगम पहुँचे, तब पता चला कि यमुनाचार्य का निधन हो चुका है।

इससे रामानुज अत्यंत दुखी हो गए और उन्होंने कुछ समय के लिए श्रीरंगनाथ की पूजा तक छोड़ दी।

बाद में वैष्णव परंपरा के वरिष्ठ लोगों ने महसूस किया कि यमुनाचार्य के बाद एक योग्य नेतृत्व की कमी है, इसलिए महापूर्ण को फिर से रामानुज को बुलाने भेजा गया।

कांची में जीवन

कांची में रामानुज की मुलाकात कांचीपूर्ण नामक एक भक्त से हुई।

रामानुज ने उन्हें अपना गुरु बनाने की इच्छा जताई, लेकिन कांचीपूर्ण ने यह कहकर मना कर दिया कि वे अलग जाति के हैं और रामानुज को कोई और उपयुक्त गुरु मिल जाएगा।

बाद में उन्होंने बताया कि भगवान वरदराज ने स्वयं रामानुज को श्रीरंगम जाने का आदेश दिया है।

वैष्णव धर्म में दीक्षा

महापूर्ण जब रामानुज को लेने कांची आए, तो रास्ते में मदुरंथकम में दोनों की मुलाकात हो गई।

रामानुज ने तुरंत उनसे वैष्णव परंपरा में दीक्षा देने का अनुरोध किया।

महापूर्ण ने उन्हें पंचसंस्कार (पाँच संस्कार) देकर श्रीवैष्णव धर्म में दीक्षित किया।

उत्पीड़न

कुछ कथाओं के अनुसार, चोल राजा कुलोत्तुंग द्वितीय श्रीवैष्णव परंपरा के विरोधी थे।

रामानुज के शिष्य कूरथाझ्वान ने उन्हें राज्य छोड़ने की सलाह दी।

इसके बाद रामानुज होयसला राज्य चले गए और वहाँ 14 वर्षों तक रहे।

इस दौरान उन्होंने एक जैन राजा बिट्टि देव को हिंदू धर्म में परिवर्तित किया, जिसका नाम बाद में विष्णुवर्धन रखा गया।

राजा की सहायता से उन्होंने कर्नाटक के मेलुकोटे में तिरुनारायणस्वामी मंदिर का निर्माण कराया।

बाद में चोल राजा की मृत्यु के बाद वे वापस तमिलनाडु लौट आए।

सुधार कार्य (Reformation)

रामानुज ने समाज में फैले जातिगत भेदभाव का विरोध किया।

उन्होंने निम्न वर्गों (जिन्हें अछूत माना जाता था) को भी श्रीवैष्णव भक्ति आंदोलन में शामिल किया।

उन्होंने उन्हें “तिरुकुलत्तर” (उच्च कुल के लोग) कहा और उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने मेलुकोटे मंदिर में सभी वर्गों के लोगों को प्रवेश दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सामाजिक परिवर्तन

रामानुज ने—

  • मंदिरों में गैर-ब्राह्मणों की भागीदारी बढ़ाई
  • सामाजिक समानता को बढ़ावा दिया

इसके परिणामस्वरूप श्रीवैष्णव समुदाय दो भागों में विभाजित हो गया—

  • वडकलै (उत्तर परंपरा)
  • तेनकलै (दक्षिण परंपरा)

दोनों परंपराएँ आज भी पंचसंस्कार के माध्यम से दीक्षा को मान्यता देती हैं।

जीवन पर हमले

रामानुज के जीवन पर कई बार हमले हुए—

1. यादव प्रकाश द्वारा षड्यंत्र

उनके गुरु यादव प्रकाश उनकी बढ़ती प्रसिद्धि से ईर्ष्या करने लगे और गंगा यात्रा के दौरान उन्हें मारने की योजना बनाई।

लेकिन उनके चचेरे भाई गोविंद ने उन्हें चेतावनी दी, जिससे वे बच निकले।

2. विष देने का प्रयास

श्रीरंगम मंदिर के मुख्य पुजारी ने भी उन्हें विष देकर मारने का प्रयास किया।

लेकिन उनकी पत्नी ने यह योजना पहले ही बता दी।

बाद में मंदिर के पवित्र जल (तीर्थ) में भी विष मिलाया गया, लेकिन रामानुज को कुछ नहीं हुआ।

इससे प्रभावित होकर पुजारी ने उनसे क्षमा मांगी।

प्रमुख रचनाएँ

श्रीवैष्णव परंपरा के अनुसार रामानुज ने कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे—

  • वेदार्थ संग्रह
  • श्री भाष्य (ब्रह्मसूत्र भाष्य)
  • भगवद्गीता भाष्य
  • गद्यत्रय (शरणागति गद्य, श्रीरंग गद्य, वैकुण्ठ गद्य)
  • वेदांत दीप और वेदांत सार

दर्शन

रामानुज का दर्शन विशिष्टाद्वैत (Qualified Non-dualism) पर आधारित है।

यह वेदांत की तीन प्रमुख शाखाओं में से एक है—

  • अद्वैत (आदि शंकराचार्य)
  • द्वैत (मध्वाचार्य)
  • विशिष्टाद्वैत (रामानुज) 

रामानुज का ज्ञानमीमांसा (Epistemology)

रामानुज की ज्ञानमीमांसा अत्यंत यथार्थवादी (realistic) थी, जिसे सामान्य अनुभववाद (empiricism) के समान माना जाता है।

उनके अनुसार ज्ञान के तीन प्रमुख स्रोत हैं—

  1. प्रत्यक्ष (Perception)
  2. अनुमान (Inference)
  3. शब्द (Scriptural testimony)

प्रत्यक्ष और अनुमान विश्वसनीय हैं, भले ही मनुष्य “आदिकालीन अज्ञान” से प्रभावित हो।

रामानुज के अनुसार—
👉 ज्ञान हमेशा वास्तविक वस्तुओं का ही होता है, यहाँ तक कि स्वप्न में भी
👉 त्रुटि केवल गलत धारणा या गलत अनुमान के कारण होती है

उन्होंने कहा कि ईश्वर (ब्रह्म) का ज्ञान मुख्यतः वेदों और उपनिषदों से ही प्राप्त होता है, न कि केवल इंद्रियों या तर्क से।

भक्ति और ज्ञान

रामानुज के अनुसार भक्ति स्वयं एक ज्ञान की अवस्था (epistemic state) है।

जब भक्ति दृढ़ हो जाती है, तो वह पराभक्ति बन जाती है—जो भक्ति का सर्वोच्च रूप है।

👉 भक्ति ही ब्रह्म के स्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभव है
👉 इसलिए भक्ति भी एक प्रकार का ज्ञान (ज्ञान) है

रामानुज का तत्वमीमांसा (Ontology)

रामानुज एक यथार्थवादी दार्शनिक थे और उन्होंने माया (भ्रम) की अवधारणा का विरोध किया।

उनके अनुसार तीन वास्तविकताएँ हैं—

  1. भौतिक जगत (पदार्थ)
  2. जीवात्माएँ (चेतन आत्माएँ)
  3. ब्रह्म (परम सत्य)

ये तीनों अलग-अलग स्तर की चेतना रखते हैं, लेकिन सभी वास्तविक हैं।

विशिष्टाद्वैत का सिद्धांत

रामानुज के अनुसार—
👉 जीव और ब्रह्म जुड़े हुए हैं, लेकिन अलग भी हैं
👉 सच्चा प्रेम तभी संभव है जब दोनों की पहचान अलग हो

इसलिए उन्होंने विशिष्टाद्वैत (Qualified Non-dualism) का सिद्धांत प्रस्तुत किया।

शरीर-आत्मा का सिद्धांत

रामानुज के दर्शन में एक महत्वपूर्ण विचार है—

👉 पूरा ब्रह्मांड (जीव और प्रकृति) भगवान का शरीर है
👉 और भगवान उस शरीर की आत्मा हैं

इसे “शरीर-शरीरी भाव” कहा जाता है।

उपनिषद में भी कहा गया है—

“जो आत्मा सबके भीतर स्थित है, जिसे सभी नहीं जानते,
जो सभी प्राणियों का नियंत्रण करता है—वही अमर है।”

मोक्ष सिद्धांत (Soteriology)

रामानुज के अनुसार जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है—

👉 अपने वास्तविक स्वरूप को जानना
👉 और ब्रह्म के स्वरूप को समझना

मोक्ष का अर्थ केवल जन्म-मरण से मुक्ति नहीं है, बल्कि—
👉 ब्रह्म के चिंतन से प्राप्त होने वाला आनंद

मोक्ष का मार्ग

रामानुज के अनुसार—

  • केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है
  • भक्ति योग ही मुक्ति का मुख्य मार्ग है

भक्ति के माध्यम से—

  • भगवान की स्तुति
  • पूजा
  • ध्यान

के द्वारा व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है।

ब्रह्म का स्वरूप

रामानुज के अनुसार ब्रह्म—

  • सर्वशक्तिमान (Omnipotent)
  • सर्वज्ञ (Omniscient)
  • अनंत प्रेम से युक्त

है।

उन्होंने कहा—

“ब्रह्म का ज्ञान अनंत और स्थायी आनंद देता है, इसलिए शास्त्र कहते हैं—‘ब्रह्म ही आनंद है’।”

नैतिक दर्शन (Ethics)

रामानुज के अनुसार नैतिकता का दो प्रकार से महत्व है—

1. आंतरिक (Intrinsic)

👉 यह ईश्वर के दिव्य स्वभाव को दर्शाती है

2. साधनात्मक (Instrumental)

👉 यह कर्मों के दोष को कम करती है और मोक्ष की ओर ले जाती है

उन्होंने कर्मयोग को अधिक व्यावहारिक माना और कहा कि व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

शंकराचार्य की आलोचना

रामानुज ने आदि शंकराचार्य के अद्वैत सिद्धांत की आलोचना की।

उनके मुख्य तर्क थे—

  • ब्रह्म केवल निराकार चेतना नहीं है
  • माया और अज्ञान की अवधारणा में त्रुटियाँ हैं
  • कर्म ही अज्ञान का कारण है

वेदों की व्याख्या

रामानुज के अनुसार—

👉 वेद एक समग्र और एकीकृत ग्रंथ हैं
👉 उन्हें आंशिक रूप से नहीं समझना चाहिए

उन्होंने कहा कि—

  • कुछ विद्वान केवल अद्वैत के समर्थन वाले भागों को लेते हैं
  • और अन्य भागों को अनदेखा करते हैं

लेकिन सत्य यह है कि—
👉 वेदों में एकता (oneness) और विविधता (plurality) दोनों का वर्णन है

इसलिए सही निष्कर्ष है—
👉 विशिष्ट अद्वैत (Qualified Non-dualism)

अन्य वेदांत स्कूलों से तुलना

मध्वाचार्य (द्वैत) से तुलना

  • दोनों आत्मा और ब्रह्म को अलग मानते हैं
  • लेकिन रामानुज कहते हैं कि दोनों जुड़े भी हैं

शंकराचार्य (अद्वैत) से तुलना

  • शंकराचार्य → केवल ब्रह्म ही सत्य
  • रामानुज → ब्रह्म और जगत दोनों सत्य

प्रभाव (Influence)

समग्र प्रभाव

रामानुज को श्रीवैष्णव परंपरा के मुख्य व्याख्याता और संस्थापक विचारक के रूप में माना जाता है।

विद्वान हैरोल्ड कावर्ड के अनुसार—
👉 रामानुज श्रीवैष्णव ग्रंथों के प्रमुख व्याख्याता थे

वहीं विदुषी वेंडी डोनिगर उन्हें—
👉 भक्ति-आधारित हिंदू धर्म के सबसे प्रभावशाली चिंतकों में से एक मानती हैं

जे. ए. बी. वान ब्यूटेनन के अनुसार—
👉 रामानुज ने भक्ति को एक बौद्धिक आधार प्रदान किया
👉 और इसे हिंदू धर्म की प्रमुख शक्ति बना दिया

प्रमुख मंदिर और परंपरा

रामानुज की परंपरा से जुड़े कई प्रमुख वैष्णव मंदिर हैं, जैसे—

  • श्रीरंगम रंगनाथस्वामी मंदिर
  • तिरुपति वेंकटेश्वर मंदिर

इन मंदिरों में आज भी उनके धार्मिक सिद्धांतों का पालन किया जाता है।

वैश्विक तुलना

आधुनिक विद्वानों ने हिंदू धर्म में रामानुज के महत्व की तुलना पश्चिमी ईसाई धर्म के महान धर्मशास्त्री थॉमस एक्विनास से की है।

श्रीरंगम और संगठन

रामानुज ने श्रीरंगम मंदिर का पुनर्गठन किया और भारत भर में यात्राएँ कीं।

👉 उन्होंने अपने संगठन का विस्तार किया
👉 मंदिरों को अपने विचारों का केंद्र बनाया

यहीं उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “श्री भाष्य” लिखी, जो विशिष्टाद्वैत दर्शन का प्रमुख ग्रंथ है।

भक्ति आंदोलन में योगदान

रामानुज ने—

  • विष्णु-लक्ष्मी की उपासना के लिए मंदिरों का नेटवर्क स्थापित किया
  • भारत भर में यात्रा करके अपने विचारों का प्रचार किया

उनके प्रभाव से—
👉 कई संत और कवि भक्ति आंदोलन से जुड़े
👉 मैसूर और दक्कन क्षेत्र में जैन और बौद्ध धर्म से वैष्णव धर्म की ओर परिवर्तन भी हुआ

जन्मस्थान और परंपरा

चेन्नई के पास स्थित रामानुज का जन्मस्थान आज भी एक प्रमुख मंदिर और विशिष्टाद्वैत अध्ययन केंद्र के रूप में सक्रिय है।

उनकी शिक्षाएँ आज भी—

  • श्रीरंगम
  • तिरुपति

जैसे प्रमुख वैष्णव केंद्रों में जीवित हैं।

समता की प्रतिमा (Statue of Equality)

Statue of Equality रामानुज को समर्पित एक विशाल प्रतिमा है।

👉 इसका निर्माण चिन्णा जीयर द्वारा किया गया
👉 इसका उद्घाटन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 फरवरी 2022 को किया

नाम (Names)

रामानुज को विभिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे—

  • श्री रामानुजाचार्य
  • उदैयावर
  • यतिराज (संन्यासियों के राजा)
  • भाष्यकार
  • गोदाग्रजर
  • तिरुप्पावै जीयर
  • एम्बरुमानार
  • लक्ष्मण मुनि

विभिन्न नामों की उत्पत्ति

रामानुज को उनके जीवन में विभिन्न संतों और विद्वानों द्वारा अलग-अलग नाम दिए गए—

  • इलयाझवार – पेरिया तिरुमलाई नंबी द्वारा
  • भूधा पुरिसर – श्रीपेरंबुदूर आदिकेशव पेरुमल द्वारा
  • अम मुदलवन एवन – यमुनाचार्य द्वारा
  • एथिराज / रामानुज मुनि – कांची पेरारुलाल पेरुमल द्वारा
  • उदैयावर – श्रीरंगम पेरिया पेरुमल द्वारा
  • एम्पेरुमानार – तिरुकोष्टियूर नंबी द्वारा
  • तिरुप्पावै जीयर – पेरिया नंबी द्वारा
  • लक्ष्मण मुनि – तिरुवारंग पेरुमल अरयर द्वारा
  • सदागोपन पोनाडी – तिरुमलाईयंदन द्वारा
  • श्री भाष्यकार – कलैमगल द्वारा
  • देशी केंदिरन – तिरुपति तिरुवेंकटमुदयन द्वारा
  • कोइल अन्नन – श्रीविल्लिपुथुर कोथई नाचियार द्वारा

Reference Wikipedia