नारायणप्रसाददासजी स्वामी

नारायणप्रसाददासजी स्वामी

त्रिवेणी धाम , शाहपुरा , जयपुर , राजस्थान
सौराष्ट्र, काठियावाड़ एजेंसी (वर्तमान गुजरात, भारत)

Divine Journey & Teachings

नारायणप्रसाददासजी स्वामी 

परिचय

नारायणप्रसाददासजी स्वामी (14 जनवरी 1921 – 30 जनवरी 2018), जिनका जन्म नाम गिरधर प्रेमजीभाई रडाडिया था, स्वामीनारायण संप्रदाय के एक अत्यंत प्रतिष्ठित संत थे। उन्हें उनके अनुयायियों द्वारा तपोमूर्ति शास्त्री स्वामी और गुरुजी के नाम से भी जाना जाता था। उन्हें भारत के महान और प्रसिद्ध हिंदू संतों में से एक माना जाता है।

व्यक्तिगत जीवन

जन्म

  • जन्म नाम: गिरधर प्रेमजीभाई रडाडिया
  • जन्म तिथि: 14 जनवरी 1921 (मकर संक्रांति के दिन)
  • जन्म स्थान: सौराष्ट्र, काठियावाड़ एजेंसी (वर्तमान गुजरात, भारत)

मृत्यु

  • मृत्यु तिथि: 30 जनवरी 2018
  • आयु: 97 वर्ष
  • स्थान: जामनगर, गुजरात, भारत

धार्मिक जीवन

धर्म

  • हिंदू धर्म

संप्रदाय

  • स्वामीनारायण संप्रदाय

गुरु

  • गोपालजीवनदासजी स्वामी

प्रारंभिक जीवन 

नारायणप्रसाददासजी स्वामी का जन्म एक वैष्णव-पटिदार परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रेमजीभाई और माता का नाम जुथीबेन था। उनके चार अन्य भाई-बहन भी थे, जिनमें गिरधर सबसे छोटे थे।

वे अत्यंत गरीब परिवार से थे, जिसके कारण वे अपनी प्रारंभिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर सके। हालांकि बचपन से ही उनमें आध्यात्मिकता के प्रति गहरी रुचि थी। वे अपने मित्रों के साथ स्वामीनारायण मंदिरों में जाकर भजन-कीर्तन गाते थे।

उनकी प्रतिभा और मधुर गायन से प्रभावित होकर स्वामीनारायण संप्रदाय के संतों ने उन्हें अपने साथ ले जाने की अनुमति उनके परिवार से ली। बाद में उन्हें संत बनाने का निर्णय लिया गया, लेकिन परिवार की असहमति के कारण उनके बड़े भाई उन्हें वापस घर ले आए।

इसके बावजूद, संतों के जीवन से प्रभावित होकर उन्होंने मात्र 12 वर्ष की आयु में घर छोड़ दिया और संन्यास ग्रहण कर लिया।

धार्मिक शिक्षा 

संप्रदाय में प्रवेश करने के बाद उन्होंने गुजरात में अपनी प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा पूरी की। इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय गए।

  • उन्होंने संस्कृत में छह विभिन्न धार्मिक विषयों में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की
  • उन्हें “संस्कृताचार्य” की उपाधि से सम्मानित किया गया
  • उन्होंने शास्त्री की डिग्री भी प्राप्त की

काशी में अध्ययन के दौरान उन्होंने कई महान संतों और विद्वानों के साथ अध्ययन किया, जैसे:

  • पांडुरंग शास्त्री आठवले
  • डोंगरेजी महाराज
  • स्वामी सच्चिदानंद
  • स्वामी सत्यमित्रानंद

उन्होंने संस्कृत में “ज्ञान विलास” नामक पुस्तक भी लिखी।

कथाएँ, तपस्या और उपवास 

नारायणप्रसाददासजी स्वामी ने अपने जीवन में 100 से अधिक कथाएँ कीं, जो मुख्यतः:

  • भागवत पुराण
  • भक्तचिंतामणि
  • वचनामृत

पर आधारित थीं।

उनका जीवन विशेष रूप से उनकी कठोर तपस्या के लिए प्रसिद्ध था। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम 30 वर्षों में गुजरात के द्वारका के पास अरंभड़ा गाँव में स्थित शांति कुटीर में गहन तपस्या की।

  • वे प्रतिदिन केवल एक लीटर दूध का सेवन करते थे
  • कभी-कभी नारियल पानी लेते थे
  • उन्होंने लगभग 55 वर्षों तक अन्न (अनाज) का सेवन नहीं किया

इसी कारण उन्हें “तपोमूर्ति” (तपस्वी) कहा जाता था।

कीर्तन 

स्वामीजी को बचपन से ही कीर्तन गाने का बहुत शौक था।

  • उन्हें 1000 से अधिक कीर्तन याद थे
  • उनके मधुर स्वर के कारण उनके भक्तों ने उनके कीर्तन रिकॉर्ड किए
  • उनकी मृत्यु के बाद भी उनके कीर्तन प्रकाशित किए गए

पुरस्कार 

नारायणप्रसाददासजी स्वामी को संस्कृत भाषा में उनके ज्ञान और योगदान के लिए भारत के दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा सम्मानित किया गया।

मृत्यु

जीवन के अंतिम समय में वे प्रोस्टेट रोग से पीड़ित थे।

  • उन्हें अरंभड़ा से जामनगर के स्वामीनारायण गुरुकुल (नाघेड़ी) में स्थानांतरित किया गया
  • वहीं उनकी सर्जरी की गई

30 जनवरी 2018 को दोपहर लगभग 12 बजे उनका निधन हो गया।

उनका अंतिम संस्कार 31 जनवरी 2018 को वैदिक रीति से स्वामीनारायण संतों और भक्तों की उपस्थिति में किया गया।

मीडिया कवरेज 

उनके निधन के बाद उनकी मृत्यु की आधिकारिक पुष्टि जामनगर स्वामीनारायण गुरुकुल के संतों द्वारा की गई।

उनके जीवन और निधन पर कई प्रमुख गुजराती समाचार पत्रों और ऑनलाइन पोर्टलों जैसे:

  • दिव्य भास्कर
  • संदेश
  • आजकाल
  • नोबत
  • अकिला न्यूज़

में लेख प्रकाशित किए गए।

Reference Wikipedia