नित्यानंद (बंगाली: নিত্যানন্দ; लगभग 1474 – लगभग 1540), जिन्हें नित्यानंद प्रभु या निताई भी कहा जाता है, बंगाल की गौड़ीय वैष्णव परंपरा के एक प्रमुख धार्मिक व्यक्तित्व थे। वे चैतन्य महाप्रभु के मित्र और शिष्य थे।
गौड़ीय वैष्णव परंपरा के अनुसार, नित्यानंद को बलराम का अवतार माना जाता है, जबकि चैतन्य महाप्रभु को भगवान कृष्ण का अवतार माना जाता है।
नित्यानंद प्रभु गौड़ीय वैष्णव परंपरा के प्रमुख प्रचारकों में से एक थे और उन्होंने भक्ति आंदोलन को व्यापक रूप से फैलाया।
नित्यानंद का जन्म एक धार्मिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनमें भक्ति और भजन गाने की विशेष प्रतिभा दिखाई देती थी।
बाल्यावस्था में वे रामायण के प्रसंगों में भाग लेते थे और भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण की भूमिका निभाते थे।
लगभग 13 वर्ष की आयु में उन्होंने एक संन्यासी लक्ष्मीपति तीर्थ के साथ घर छोड़ दिया और तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े। उनके पिता ने वचन निभाते हुए उन्हें संन्यासी के साथ भेज दिया।
इस यात्रा के दौरान वे कई महान संतों के संपर्क में आए, जैसे:
नित्यानंद ने सूर्यदास सारखेल की दो पुत्रियों वसुधा और जाह्नवा देवी से विवाह किया। विवाह के बाद वे पश्चिम बंगाल के खड़दह में बस गए।
उनके पुत्र वीरभद्र बाद में वैष्णव परंपरा के प्रमुख आचार्य बने।
नित्यानंद और चैतन्य महाप्रभु के कार्यों का बंगाल और पूर्वी भारत पर गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक प्रभाव पड़ा।
उनके प्रमुख शिष्यों में “बारह गोपाल” (Twelve Gopalas) शामिल थे, जिन्होंने इस भक्ति परंपरा का प्रचार किया।
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