नायनार (या नायनमार; तमिल: நாயன்மார்) 6वीं से 8वीं शताब्दी ईस्वी के बीच दक्षिण भारत में रहने वाले 63 तमिल शैव संतों का एक समूह थे। इन संतों ने प्रारंभिक मध्यकालीन दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन को गहराई से प्रभावित किया।
इनके समकालीन आलवार संतों के साथ मिलकर नायनारों ने भक्ति आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाया।
नायनारों के नामों का प्रथम संकलन सुंदरर द्वारा किया गया था। बाद में नम्बियंदर नम्बि ने तिरुमुरै ग्रंथ के संकलन के दौरान इस सूची का विस्तार किया, जिसमें सुंदरर और उनके माता-पिता को भी शामिल किया गया।
नालवर (चार प्रमुख संत) नायनारों में सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं:
नायनारों की सूची सबसे पहले सुंदरर ने अपने भजन “तिरुथोंडा थोगै” में प्रस्तुत की थी, जिसमें उन्होंने 11 पदों के माध्यम से संतों के नामों का उल्लेख किया और स्वयं को “सेवकों का सेवक” कहा।
इस प्रारंभिक सूची में संतों के जीवन का विस्तृत विवरण नहीं था, जिसे बाद में तेवारम जैसे ग्रंथों में विस्तार से बताया गया।
10वीं शताब्दी में राजराज चोल प्रथम ने अपने दरबार में इन भजनों को सुनने के बाद तेवारम ग्रंथों का संकलन करवाया। उनके पुरोहित नम्बियंदर नम्बि ने इन भजनों को तिरुमुरै नामक ग्रंथों की श्रृंखला में व्यवस्थित किया।
तिरुमुरै के प्रमुख भाग:
12वीं शताब्दी में सेक्किजार ने पेरिया पुराणम नामक ग्रंथ जोड़ा, जिसमें 63 नायनारों के जीवन का विस्तृत वर्णन किया गया।
नायनार विभिन्न सामाजिक वर्गों से आते थे, जैसे:
इससे यह स्पष्ट होता है कि भक्ति आंदोलन ने जाति-भेद से ऊपर उठकर सभी को समान महत्व दिया।
नायनार दक्षिण भारत के प्रमुख हिंदू संतों में गिने जाते हैं और उन्होंने शैव सिद्धांत के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कन्नड़ साहित्य में भी नायनारों पर कई रचनाएँ लिखी गई हैं, जैसे कवि हरिहर द्वारा लिखित ग्रंथ।
63 नायनारों की मूर्तियाँ अक्सर शिव मंदिरों में स्थापित की जाती हैं।
हालाँकि सुंदरर की मूल सूची किसी विशेष क्रम में नहीं थी, लेकिन बाद में विभिन्न परंपराओं ने मंदिरों में उनकी मूर्तियों को क्रमबद्ध रूप से स्थापित करना प्रारंभ किया।
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