नरहरि तीर्थ
परिचय
नरहरि तीर्थ (लगभग 1243 – लगभग 1333) एक महान द्वैत (Dvaita) दार्शनिक, विद्वान, राजनेता और मध्वाचार्य के प्रमुख शिष्यों में से एक थे।
उन्हें हरिदास आंदोलन के प्रारंभकर्ताओं में से एक माना जाता है, जिसमें श्रीपादराज भी शामिल थे।
नरहरि तीर्थ को कर्नाटक संगीत के प्रारंभिक ज्ञात संगीतकारों में भी गिना जाता है।
व्यक्तिगत जीवन
जन्म
- जन्म नाम: श्यामा शास्त्री
- जन्म वर्ष: 1243
- जन्म स्थान: कलिंग (वर्तमान ओडिशा)
मृत्यु
- मृत्यु वर्ष: 1333
- आयु: लगभग 89–90 वर्ष
- स्थान: हम्पी, कर्नाटक
धार्मिक जीवन
धर्म
संप्रदाय / आदेश
दर्शन (Philosophy)
गुरु
जीवन परिचय
नरहरि तीर्थ के प्रारंभिक जीवन के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है।
- वे कलिंग (वर्तमान ओडिशा और आंध्र प्रदेश क्षेत्र) के पूर्वी गंग वंश में मंत्री थे
- बाद में वे नरसिंह देव द्वितीय के शासनकाल में संरक्षक (Regent) भी बने
- इसके बाद उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और एक संत के रूप में जीवन बिताया
उनके जीवन की जानकारी मुख्यतः निम्न स्रोतों से मिलती है:
- नरहरियातिस्तोत्र
- मध्व विजय (नारायण पंडित)
- श्रीकूर्मम और सिम्हाचलम मंदिर के शिलालेख
राजनीतिक और सामाजिक योगदान
- वे एक प्रभावशाली मंत्री और शासक थे
- 1281 ई. के बाद उन्हें “देश का वास्तविक शासक” माना जाता था
निर्माण कार्य
- उन्होंने योगानंद नरसिंह मंदिर (श्रीकूर्मम) का निर्माण कराया
- सिम्हाचलम मंदिर को एक प्रसिद्ध शैक्षिक और धार्मिक केंद्र बनाया
सुरक्षा कार्य
- उन्होंने अपने राज्य को आक्रमणों से सुरक्षित रखा
धर्म प्रचार और प्रभाव
- उन्होंने द्वैत वेदांत का प्रचार पूरे कलिंग क्षेत्र में किया
- उन्हें भानुदेव प्रथम और नरसिंह देव द्वितीय का संरक्षण प्राप्त था
संगीत और भक्ति योगदान
नरहरि तीर्थ को:
👉 कर्नाटक संगीत का पहला ज्ञात रचनाकार माना जाता है
- उन्होंने “रघुकुलतिलक” नाम से भक्ति गीत रचे
- उनकी रचनाएँ सरल भाषा में थीं, जिससे आम लोग उन्हें समझ सकें
रचनाएँ
उनकी प्रमुख रचना:
- भावप्रकाशिका – यह मध्वाचार्य के गीता भाष्य पर आधारित एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है
इस ग्रंथ में:
- उन्होंने जटिल विचारों को सरल बनाया
- शंकराचार्य और रामानुजाचार्य के विचारों की आलोचना भी की
उनकी कुछ रचनाएँ कन्नड़ भाषा में थीं, जिनमें से केवल तीन ही आज उपलब्ध हैं
हरिदास आंदोलन में योगदान
नरहरि तीर्थ और श्रीपादराज को हरिदास आंदोलन का अग्रदूत माना जाता है।
- उन्होंने भक्ति गीतों के माध्यम से द्वैत दर्शन को सरल रूप में प्रस्तुत किया
- उनकी रचनाएँ कन्नड़ भाषा में थीं
नाट्य और सांस्कृतिक योगदान
परंपरा के अनुसार:
- नरहरि तीर्थ को यक्षगान (Yakshagana) और बयलाटा जैसे नृत्य-नाट्य रूपों का प्रारंभकर्ता भी माना जाता है
- ये परंपराएँ आज भी कर्नाटक और केरल के कुछ भागों में प्रचलित हैं
समाधि स्थल
- उनकी समाधि चक्रतीर्थ (हम्पी के पास) स्थित है
Reference Wikipedia