गोरखनाथ
परिचय
गोरखनाथ एक महान हिन्दू योगी, महायोगी और सिद्ध संत थे, जिन्हें नाथ संप्रदाय का प्रमुख प्रवर्तक माना जाता है। वे मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य थे और भारत में नाथ योगी परंपरा को संगठित रूप देने वाले संतों में प्रमुख हैं।
व्यक्तिगत जीवन
- काल: 11वीं, 12वीं या 14वीं शताब्दी (मतभेद)
- प्रसिद्धि: हठयोग, नाथ योगी संगठन
- सम्मान: महायोगी
धार्मिक जीवन
- धर्म: हिन्दू धर्म
- संप्रदाय: नाथ संप्रदाय (शैव परंपरा)
- दर्शन: हठयोग
गुरु और परंपरा
- गुरु: मत्स्येन्द्रनाथ
- नाथ परंपरा में उन्हें नवनाथों में से एक माना जाता है
- इस परंपरा के प्रथम गुरु भगवान शिव (आदिनाथ) माने जाते हैं
जीवन परिचय
इतिहासकारों के अनुसार गोरखनाथ का जीवनकाल 11वीं से 14वीं शताब्दी के बीच माना जाता है, हालांकि इस पर मतभेद हैं।
- कुछ विद्वान उन्हें 11वीं–12वीं शताब्दी का मानते हैं
- कुछ 13वीं या 14वीं शताब्दी का
उनका उल्लेख संत कबीर और गुरु नानक की वाणी में भी मिलता है, जिससे उनकी व्यापक प्रसिद्धि का पता चलता है।
आध्यात्मिक विचार
गोरखनाथ ने:
- योग, साधना और गुरु के मार्गदर्शन को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया
- किसी एक सिद्धांत पर जोर न देकर सत्य की खोज को महत्व दिया
उन्होंने कहा कि:
निष्पक्ष रूप से सत्य की खोज करना ही मनुष्य का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए।
उन्होंने योग और साधना के माध्यम से समाधि और मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग बताया।
योग और योगदान
- हठयोग के प्रमुख प्रवर्तकों में से एक
- नाथ संप्रदाय के मठों और मंदिरों की स्थापना
- योग और आध्यात्मिक अनुशासन का प्रचार
उनके अनुयायी:
लोकप्रियता और प्रभाव
- भारत के कई राज्यों में उनके मंदिर और मठ हैं
- गोरखपुर शहर का नाम उन्हीं पर पड़ा है
- नेपाल में उन्हें राष्ट्रीय संत के रूप में पूजा जाता है
- तमिलनाडु की सिद्ध परंपरा में भी उन्हें 18 सिद्धरों में गिना जाता है
जीवन की कथाएँ
- उन्हें समय से परे (अमर) योगी माना जाता है
- विभिन्न युगों में उनके प्रकट होने की कथाएँ मिलती हैं
- उन्होंने अनेक स्थानों पर तपस्या की
नाथ संप्रदाय
नाथ परंपरा गोरखनाथ से पहले भी अस्तित्व में थी, लेकिन:
- उन्होंने इसे संगठित रूप दिया
- योग साधना को जन-जन तक पहुँचाया
उनसे संबंधित कई गुफाएँ और मंदिर भारत में पाए जाते हैं, जहाँ उन्होंने ध्यान किया था।
गोरखनाथ मठ
परिचय
गोरखनाथ मठ एक प्रमुख मठ (मोनास्ट्री) है, जो नाथ संप्रदाय से संबंधित है और महान संत गोरखनाथ के नाम पर स्थापित है।
यह मठ उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में स्थित है और इसी संत के नाम पर इस शहर का नाम भी पड़ा है।
मठ का इतिहास
- इस स्थान पर प्राचीन काल से एक मंदिर या तीर्थ स्थल मौजूद था
- बाद में इसे अलाउद्दीन खिलजी के समय मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया
- इसके बाद नाथ संप्रदाय के अनुयायियों ने यहाँ पुनः एक छोटा मंदिर बनाया
- 18वीं, 19वीं और 20वीं शताब्दी में इसमें कई विस्तार और निर्माण कार्य किए गए
यह मठ आज एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित हो चुका है।
विशेषताएँ
- यह मठ गोरखपुर शहर का प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र है
- यहाँ धार्मिक ग्रंथों का प्रकाशन भी किया जाता है
- विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ आयोजित होती हैं
यह मठ विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोगों के बीच सामंजस्य (Syncretism) का प्रतीक भी माना जाता है।
प्रभाव
हठयोग
- कुछ विद्वान हठयोग की उत्पत्ति को नाथ योगियों, विशेषकर गोरखनाथ और उनके गुरु मत्स्येन्द्रनाथ से जोड़ते हैं
- हालांकि कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार इसकी उत्पत्ति अन्य परंपराओं से भी जुड़ी हो सकती है
फिर भी, गोरखनाथ और नाथ योगियों का हठयोग से गहरा संबंध माना जाता है।
लंगर परंपरा
- नाथ संप्रदाय द्वारा निःशुल्क भोजन (लंगर) की परंपरा चलाई जाती थी
- यह परंपरा सिख धर्म के प्रारंभ से पहले से ही प्रचलित थी
- आज भी गोरखनाथ मंदिर में आने वाले भक्तों को भोजन कराया जाता है
नेपाल में प्रभाव
- नेपाल के गोरखा क्षेत्र का नाम गोरखनाथ के नाम पर पड़ा है
- वहाँ एक गुफा है जहाँ उनके पदचिह्न (पादुका) स्थित हैं
- हर वर्ष बैसाख पूर्णिमा पर “रोट महोत्सव” मनाया जाता है
- कहा जाता है कि यह परंपरा लगभग 700 वर्षों से चल रही है
नेपाल के डांग क्षेत्र में भी उनके शिष्यों की परंपरा लंबे समय से विद्यमान है।
सिद्ध परंपरा
- तमिलनाडु की सिद्ध परंपरा में गोरखनाथ को 18 सिद्धरों में से एक माना जाता है
- वहाँ उन्हें कोरक्कर नाम से जाना जाता है
- उनके कई मंदिर और गुफाएँ तमिलनाडु और श्रीलंका में स्थित हैं
उन्होंने चिकित्सा, दर्शन और रसायन (Alchemy) से संबंधित गूढ़ काव्य भी लिखा।
पश्चिम बंगाल – असम – त्रिपुरा – बांग्लादेश
पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असम राज्यों तथा बांग्लादेश में बंगाली हिन्दू समुदाय के भीतर नाथ संप्रदाय के अनुयायियों की बड़ी संख्या पाई जाती है।
- इन्हें सामान्यतः नाथ या योगी नाथ कहा जाता है
- इनका नाम महान योगी गोरखनाथ से जुड़ा हुआ है
मध्यकालीन बंगाल में इन समुदायों को सामाजिक रूप से हाशिए पर रखा गया था।
रचनाएँ
भारतीय योग इतिहास की लेखिका रोमोला बुटालिया के अनुसार, गोरखनाथ से संबंधित प्रमुख ग्रंथ हैं:
- गोरक्षशतक (Gorakṣaśataka)
- गोरक्ष संहिता (Goraksha Samhita)
- गोरक्ष गीता (Goraksha Gita)
- सिद्ध सिद्धांत पद्धति (Siddha Siddhanta Paddhati)
- योग मार्तंड (Yoga Martanda)
- योग सिद्धांत पद्धति (Yoga Siddhanta Paddhati)
- योगबीज (Yogabīja)
- योगचिंतामणि (Yogacintamani)
सिद्ध सिद्धांत पद्धति
सिद्ध सिद्धांत पद्धति एक महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ है, जिसे नाथ परंपरा में गोरखनाथ से संबंधित माना जाता है।
- यह हठयोग के प्रारंभिक ग्रंथों में से एक है
- इसमें “अवधूत योगी” (मुक्त आत्मा) के स्वरूप का वर्णन मिलता है
दर्शन और सिद्धांत
यह ग्रंथ अद्वैत (एकत्व) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें योगी यह अनुभव करता है कि:
“सभी प्राणियों में वही स्वयं है और स्वयं में सभी प्राणी हैं।”
इसमें आत्मा (आत्मन) और ब्रह्म (ब्रह्मन्) की एकता का वर्णन किया गया है।
वर्ण व्यवस्था की व्याख्या
इस ग्रंथ में चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) को व्यक्ति के गुणों से जोड़ा गया है:
- ब्राह्मण: सदाचार (धर्म और आचरण)
- क्षत्रिय: साहस और वीरता
- वैश्य: व्यापार और कार्यशीलता
- शूद्र: सेवा
योगी इन सभी गुणों को अपने भीतर अनुभव करता है, इसलिए:
- वह किसी से घृणा नहीं करता
- सभी के प्रति प्रेम रखता है
Reference Wikipedia