स्वामी निगमानंद परमहंस (जन्म: नलिनीकांत चट्टोपाध्याय; 18 अगस्त 1880 – 29 नवंबर 1935) पूर्वी भारत के एक प्रसिद्ध योगी, गुरु और रहस्यवादी संत थे। वे वेदांत, तंत्र, योग और भक्ति (प्रेम) के आध्यात्मिक आचार्य माने जाते हैं। उनके अनुयायी उन्हें “ठाकुर” कहकर संबोधित करते थे।
स्वामी निगमानंद का जन्म नदिया जिले के कुतबपुर गाँव में हुआ था। बचपन में उनका नाम नलिनीकांत रखा गया। मात्र 13 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी माता को खो दिया, जिससे वे गहरे दुःख में डूब गए।
उन्होंने मेहरपुर हाई स्कूल से शिक्षा प्राप्त की और बाद में ढाका के इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्ययन किया। 1897 में उनका विवाह सुधांशुबाला देवी से हुआ। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने दिनाजपुर जिला बोर्ड में नौकरी की।
1901 में एक अद्भुत घटना घटी—उन्होंने अपनी पत्नी की छवि देखी, जबकि वह दूर अपने गाँव में थीं। बाद में पता चला कि उसी समय उनकी मृत्यु हो चुकी थी। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और वे “मृत्यु के बाद जीवन” के रहस्य को जानने के लिए प्रेरित हुए।
पत्नी की मृत्यु के बाद नलिनीकांत इस प्रश्न में डूब गए कि मृत्यु के बाद क्या होता है। इस खोज ने उन्हें मद्रास (चेन्नई) के थियोसोफिकल सोसाइटी तक पहुँचाया।
हालाँकि उन्होंने माध्यम के द्वारा अपनी पत्नी से संवाद भी किया, लेकिन वे संतुष्ट नहीं हुए। इसके बाद उन्होंने एक ऐसे गुरु की खोज शुरू की, जो उन्हें आत्मज्ञान प्रदान कर सके।
एक रात उन्होंने स्वप्न में एक साधु को देखा, जिसने उन्हें एक बेलपत्र पर लिखा मंत्र दिया। बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि वह साधु बामाखेपा थे।
उन्होंने बामाखेपा से दीक्षा ली और 21 दिनों तक मंत्र का जप किया। इसके फलस्वरूप उन्हें माता तारा के दर्शन हुए।
इसके बाद उन्होंने अद्वैत वेदांत का ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरु सच्चिदानंद सरस्वती की शरण ली। उनसे दीक्षा लेने के बाद उनका नाम बदलकर निगमानंद रखा गया।
निगमानंद ने विभिन्न गुरुओं से चार प्रकार की साधनाओं में सिद्धि प्राप्त की:
उन्होंने कठोर साधना के माध्यम से सविकल्प समाधि और बाद में निर्विकल्प समाधि की अवस्था प्राप्त की।
कामाख्या (गुवाहाटी) में उन्होंने निर्विकल्प समाधि का अनुभव किया, जिसे उनके अनुयायी अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक उपलब्धि मानते हैं।
1912 में अक्षय तृतीया के अवसर पर असम के कोकिलामुख में शांति आश्रम की स्थापना की गई।
उन्होंने अपने आश्रम का नाम सरस्वत मठ रखा, जो उनकी आध्यात्मिक परंपरा और देवी सरस्वती के प्रति श्रद्धा को दर्शाता है।
इस आश्रम में सभी धर्मों के लोग आकर अपनी आध्यात्मिक साधना कर सकते थे।
स्वामी निगमानंद ने बंगाली भाषा में कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे, जैसे:
अपने जीवन के अंतिम 14 वर्षों में वे पुरी में रहे। 1930 में दुर्गा चरण मोहंती नामक एक छात्र ने उन्हें नीलाचल कुटीर में देखा और उन्हें सद्गुरु के रूप में पहचाना।
1904 में स्वामी निगमानंद इलाहाबाद (प्रयाग) कुंभ मेले में गए, जहाँ उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके गुरु सच्चिदानंद सरस्वती उसी क्षेत्र में श्रींगेरी मठ के शंकराचार्य के साथ ठहरे हुए हैं।
जब उन्होंने वहाँ पहुँचकर देखा कि शंकराचार्य अपने आसन पर बैठे हैं और उनके चारों ओर लगभग 125 संन्यासी उपस्थित हैं, तो निगमानंद पहले अपने गुरु के पास गए और उन्हें प्रणाम किया। इसके बाद वे शंकराचार्य को प्रणाम करने पहुँचे।
इस पर कुछ साधुओं ने इसे अनादर माना, क्योंकि उनके अनुसार पहले “महंत” (शंकराचार्य) को प्रणाम करना चाहिए था। इस पर निगमानंद ने शास्त्र का यह श्लोक उद्धृत किया:
👉 “मन्नाथ श्री जगन्नाथ मद्गुरु श्री जगद्गुरु।
मदात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्री गुरवे नमः।”
अर्थात — “मेरा गुरु ही समस्त जगत का सर्वोच्च गुरु है, इसलिए मुझे पहले अपने गुरु का सम्मान करना चाहिए।”
उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि वेदांत के अनुसार गुरु और जगद्गुरु (शंकराचार्य) में कोई भेद नहीं है।
निगमानंद के इस उत्तर से शंकराचार्य अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने उनकी आध्यात्मिक सिद्धि को स्वीकार करते हुए उन्हें “परमहंस” की उपाधि प्रदान की। इसके बाद वे
👉 “परिब्राजकाचार्य परमहंस श्रीमद स्वामी निगमानंद सरस्वती देव”
के नाम से प्रसिद्ध हुए।
स्वामी निगमानंद ने अपने जीवन के अंतिम 14 वर्ष पुरी में व्यतीत किए।
29 नवंबर 1935 को उन्होंने कोलकाता में महासमाधि ली।
उनकी स्मृति में उनके अनुयायी प्रतिवर्ष सभाएँ (सम्मिलनी) और विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
उनके प्रमुख तीर्थस्थल:
स्वामी निगमानंद का मुख्य उद्देश्य था:
उन्होंने अपने अनुयायियों को आदर्श गृहस्थ जीवन जीने, आध्यात्मिक संगति बनाए रखने और आपसी आध्यात्मिक अनुभव साझा करने की प्रेरणा दी।
अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए उन्होंने हजारों लोगों को दीक्षा दी और उन्हें आध्यात्मिक साधना सिखाई।
उन्होंने एक विशेष शब्द “जयगुरु” का प्रचार किया, जिसका अर्थ है:
👉 “गुरु की महिमा — गुरु के द्वारा, गुरु के लिए।”
उन्होंने अपने शिष्यों को निर्देश दिया कि वे:
उनका मानना था कि इस नाम के माध्यम से कोई भी व्यक्ति ईश्वर तक पहुँच सकता है, क्योंकि ईश्वर ही समस्त जगत का गुरु है।
यह नाम किसी भी संप्रदाय या धर्म के लोगों द्वारा अपनाया जा सकता है, बिना किसी बाधा के।
स्वामी निगमानंद परमहंस के दर्शन और शिक्षाएँ अत्यंत गहन और व्यापक थीं, जिनमें गुरु, ईश्वर, आत्मज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में अर्जुन को गुरु और ईश्वर के संबंध के बारे में बताया। उन्होंने “अहम्” शब्द का प्रयोग स्वयं (गुरु) के लिए और “तत्” का प्रयोग ईश्वर के लिए किया।
👉 “तत् प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्” (भगवद्गीता 18.62)
निगमानंद अद्वैत वेदांत के संन्यासी थे और उन्होंने शंकराचार्य की परंपरा में वेदांत दर्शन का गहन अध्ययन किया।
उनकी शिक्षा के अनुसार:
निगमानंद ने स्वयं को कभी अवतार (ईश्वर का अवतरण) नहीं माना, यद्यपि उनके कई शिष्य उन्हें अवतार मानते थे।
उन्होंने कहा:
उन्होंने स्वयं को एक सद्गुरु (पूर्ण आध्यात्मिक गुरु) के रूप में स्वीकार किया, जिसने अपने वास्तविक स्वरूप (स्वरूप ज्ञान) को प्राप्त किया।
निगमानंद के अनुसार:
👉 भगवद्गीता (4.9) के अनुसार:
“जो मेरे जन्म और कर्म को दिव्य जानता है, वह पुनर्जन्म नहीं लेता और मुझे प्राप्त होता है।”
उन्होंने अपने शिष्यों को सलाह दी कि वे गुरु के स्वरूप का ध्यान करें, जिससे गुरु के गुण स्वयं उनके भीतर प्रकट हो जाएँ।
निगमानंद के अनुसार आत्म-साक्षात्कार का मार्ग है:
👉 व्यक्तिगत आत्मा का विस्तार करके उसे सार्वभौमिक आत्मा में विलीन करना
यह साधना मुख्यतः योग्य संन्यासियों द्वारा की जा सकती है, लेकिन:
उन्होंने यह भी बताया कि:
👉 (भगवद्गीता 18.54)
निगमानंद ने अद्वैत (एकत्व) और द्वैत (भक्ति) दोनों मार्गों का समन्वय किया।
उनके अनुसार:
भक्ति मार्ग में:
उन्होंने यह भी कहा कि:
इस प्रकार उन्होंने शंकराचार्य (ज्ञान) और गौरांग (भक्ति) के मार्गों को एकीकृत किया।
निगमानंद ने “ज्ञानचक्र” नामक एक आध्यात्मिक संरचना प्रस्तुत की, जिसमें:
उन्होंने इस ज्ञानचक्र में:
के बीच की अवस्था में श्रीकृष्ण और श्रीराधा (या गुरु और योगमाया) को स्थान दिया।
👉 योगमाया वह दिव्य शक्ति है जो जीवात्मा को उसकी वास्तविक प्रकृति का अनुभव कराती है और उसे ईश्वर की लीला में भाग लेने योग्य बनाती है।
स्वामी निगमानंद परमहंस की शिक्षाओं में गुरु, आत्मज्ञान, कर्म और योग के सिद्धांतों का अत्यंत गहन वर्णन मिलता है।
👉 सद्गुरु कभी किसी को शाप नहीं देते; उनका क्रोध भी शिष्य के हित में होता है।
निगमानंद के अनुसार मुक्ति के दो प्रमुख मार्ग हैं:
👉 यदि शिष्य निःस्वार्थ भाव से गुरु की सेवा करता है, तो वह आसानी से आत्मज्ञान प्राप्त कर सकता है।
निगमानंद के प्रमुख सिद्धांतों में से एक जीवनमुक्त उपासना था।
निगमानंद ने कर्म को तीन भागों में विभाजित किया:
👉
उन्होंने बताया कि:
निगमानंद के अनुसार:
👉
उन्होंने चेतावनी दी कि:
👉 यदि शरीर शुद्ध नहीं है, तो लय योग सफल नहीं हो सकता।
निगमानंद ने कहा:
👉
स्वामी निगमानंद परमहंस ने अपने जीवनकाल में कई आश्रम, संस्थान और ग्रंथों की स्थापना तथा रचना की, जिनका उद्देश्य सनातन धर्म का प्रचार, शिक्षा का प्रसार और मानव सेवा था।
स्वामी निगमानंद ने 1905 में गारो हिल्स (कोडालधोआ) में अपना पहला योग आश्रम स्थापित किया, जिसे आज गरोहिल योगाश्रम कहा जाता है।
👉 उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “योगिगुरु” इसी आश्रम में मात्र 14 दिनों में लिखी गई थी।
1912 में उन्होंने असम के जोरहाट में शांति आश्रम की स्थापना की, जिसका उद्देश्य था:
यह आश्रम बाद में सरस्वत मठ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
👉 यहाँ ऋषि विद्यालय की स्थापना की गई, जो योग शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।
स्वामी निगमानंद ने अपने दस प्रमुख शिष्यों को संन्यास दीक्षा दी।
24 अगस्त 1934 (श्रावण पूर्णिमा) को पुरी में नीलाचल सरस्वत संघ की स्थापना की गई।
इसका उद्देश्य था:
स्वामी निगमानंद ने ऐसे आश्रम स्थापित किए जहाँ किसी भी धर्म के लोग आकर अपनी श्रद्धा अनुसार पूजा कर सकते थे।
उन्होंने अविभाजित बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में पाँच प्रमुख आश्रम स्थापित किए:
स्वामी निगमानंद ने कई आध्यात्मिक ग्रंथों की रचना की, जिन्हें सामूहिक रूप से सरस्वत ग्रंथावली कहा जाता है:
👉 ये ग्रंथ सनातन धर्म की विभिन्न साधनाओं का मार्गदर्शन करते हैं।
उन्होंने “आर्य दर्पण” नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया, जिसमें धर्म और शास्त्र से संबंधित महत्वपूर्ण विषयों पर लेख प्रकाशित होते थे।
स्वामी निगमानंद ने अपने शिष्यों को कई पत्र लिखे, जिनमें से लगभग 100 पत्रों का संग्रह “ठाकुरेर चिट्ठी” नामक पुस्तक में किया गया।
अन्य प्रमुख रचनाएँ:
स्वामी निगमानंद ने एक वार्षिक सम्मेलन “भक्त सम्मिलनी” की शुरुआत की, जिसमें गृहस्थ और संन्यासी दोनों भाग लेते थे।
इसके मुख्य उद्देश्य थे:
👉 उन्होंने इसे दो भागों में विभाजित किया:
उन्होंने महिला शिष्यों के लिए अलग प्रार्थना दिवस भी निर्धारित किया।
उनके प्रमुख शिष्य मोहंती ने:
आज ओडिशा में उनके अनुयायियों द्वारा 100 से अधिक आश्रम संचालित किए जा रहे हैं।
👉 उनका जन्मदिन हर वर्ष श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है
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