महर्षि मेही परमहंस

महर्षि मेही परमहंस

कुप्पाघाट आश्रम , भागलपुर, बिहार (गंगा नदी के किनारे)
खोक्शी श्याम, जिला सहरसा, बिहार (तत्कालीन ब्रिटिश भारत)

Divine Journey & Teachings

महर्षि मेही परमहंस

 

परिचय

महर्षि मेही परमहंस (जन्म नाम: रामानुग्रह लाल दास; 28 अप्रैल 1885 – 8 जून 1986) संतमत परंपरा के एक महान संत, दार्शनिक और गुरु थे।

वे संतमत के प्रमुख आचार्य थे और उन्होंने वेद, उपनिषद, भगवद गीता, बाइबिल, कुरान तथा अन्य धर्मग्रंथों के अध्ययन के आधार पर यह सिद्ध किया कि सभी धर्मों की मूल शिक्षा एक ही है।

उनका मुख्य उद्देश्य मानव जीवन को मोक्ष की ओर ले जाना और आध्यात्मिक शांति प्रदान करना था।

व्यक्तिगत जीवन

जन्म

  • पूरा नाम: रामानुग्रह लाल दास
  • जन्म तिथि: 28 अप्रैल 1885
  • जन्म स्थान: खोक्शी श्याम, जिला सहरसा, बिहार (तत्कालीन ब्रिटिश भारत) 

मृत्यु

  • मृत्यु तिथि: 8 जून 1986
  • आयु: 101 वर्ष
  • स्थान: भागलपुर, बिहार

समाधि स्थल

  • कुप्पाघाट आश्रम, भागलपुर, बिहार 

अन्य नाम

  • मेही दास
  • गुरुमहाराज

धार्मिक जीवन

परंपरा

  • संतमत

गुरु

  • बाबा देवी साहब (मुरादाबाद)

उत्तराधिकारी

  • महर्षि संतसेवी परमहंस

दर्शन और शिक्षाएँ

महर्षि मेही परमहंस ने संतमत और अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों का प्रचार किया।

उनकी मुख्य शिक्षाएँ थीं:

  1. आंतरिक ध्यान (Inner Meditation) का नियमित अभ्यास
  2. सत्संग में भाग लेना
  3. सत्य और नैतिक जीवन जीना

उनका मानना था कि:

  • मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है
  • सांसारिक इच्छाओं का त्याग आवश्यक है
  • जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति ही सच्ची सफलता है

 

संतमत में योगदान

महर्षि मेही परमहंस ने संतमत की शिक्षाओं को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया।

उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “सत्संग योग (भाग 1–4)” में:

  • वेद, उपनिषद, पुराण, गीता आदि के उद्धरण दिए
  • संत कबीर, गुरु नानक, दादू दयाल आदि के विचार शामिल किए
  • यह सिद्ध किया कि सभी संतों और शास्त्रों की शिक्षा एक समान है

 

प्रारंभिक जीवन

महर्षि मेही का बचपन कठिन परिस्थितियों में बीता:

  • उनकी माता का निधन तब हुआ जब वे केवल 4 वर्ष के थे
  • उनका पालन-पोषण उनकी बड़ी बहन झूलन दाय और पिता ने किया

उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा गाँव में प्राप्त की और बाद में अंग्रेजी, उर्दू और फारसी भाषाएँ भी सीखी।

आध्यात्मिक झुकाव

बचपन से ही उनका झुकाव आध्यात्मिकता की ओर था:

  • वे पहले भगवान शिव के उपासक थे
  • उनका पूजा करने का तरीका अलग था — वे जमीन में कील गाड़कर उसके सामने ध्यान करते थे

धीरे-धीरे उनका मन खेल और पढ़ाई से हटकर धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में लग गया, जैसे:

  • रामचरितमानस
  • महाभारत
  • सुखसागर

 

संन्यास की ओर यात्रा

4 जुलाई 1904 को एक महत्वपूर्ण घटना घटी:

  • वे परीक्षा दे रहे थे
  • अंग्रेजी के प्रश्न का उत्तर देते समय उन्हें वैराग्य की भावना उत्पन्न हुई
  • उन्होंने परीक्षा बीच में छोड़ दी
  • और गृहस्थ जीवन को त्यागने का निर्णय लिया

यह उनके जीवन का निर्णायक मोड़ था।

गुरु और साधना यात्रा

महर्षि मेही ने अपने जीवन में कई गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की:

1. राम झा

  • ब्राह्मण पुजारी
  • उन्होंने अहिंसा का उपदेश दिया

2. रामानंद स्वामी

  • उन्होंने उन्हें
    • मानस जप
    • मानस ध्यान
    • बाह्य दृष्टि साधना
      सिखाई

3. राजेंद्र नाथ सिंह

  • उन्होंने उन्हें
    • दृष्टि साधना (Inner Light Meditation) सिखाई

मुख्य गुरु: बाबा देवी साहब

  • 1909 में विजयदशमी के दिन पहली बार दर्शन हुआ
  • उन्होंने संतमत की पूर्ण शिक्षा दी

 

आश्रम और साधना स्थल

महर्षि मेही ने कई स्थानों पर साधना की:

  • सिकलीगढ़ धरहरा
  • बनमनखी
  • मणिहारी (कटिहार)
  • भागलपुर
  • अंततः कुप्पाघाट आश्रम (भागलपुर)

यह आश्रम बाद में अखिल भारतीय संतमत सत्संग का मुख्य केंद्र बना।

प्रमुख रचनाएँ

महर्षि मेही परमहंस द्वारा लिखित प्रमुख ग्रंथ:

  • मोक्ष दर्शन
  • सत्संग योग (भाग 1–4)
  • श्री गीता योग प्रकाश
  • वेद दर्शन योग
  • ईश्वर स्वरूप और उसकी प्राप्ति
  • संतवाणी सटीक
  • ज्ञान योग युक्त ईश्वर भक्ति
  • पदावली (भजन)

आधुनिक विचारधारा में योगदान

विद्वानों के अनुसार:

  • महर्षि मेही ने संतमत को आधुनिक युग में नई दिशा दी
  • उन्होंने सनातन धर्म और संतमत के बीच सेतु का कार्य किया
  • उनकी शिक्षाएँ आज भी आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करती हैं

Reference Wikipedia